मिर्गी के इलाज के लिए सही निदान जरूरी: डॉ. सुमित सिंह, डायरेक्टर, न्यूरोलॉजी, अग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेस आर्टेमिस हॉस्पिटल, गुरुग्राम

मिर्गी मस्तिष्क की एक ऐसी गड़बड़ी है, जो मिर्गी के दौरे को प्रभावित करने के लिए एक स्थायी प्रवृत्ति की तरह काम करता है. न्यूरो-बायोलॉजिक, संज्ञानात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परिणामों द्वारा हम इस स्थिति को अच्छी तरह से समझ सकते हैं. इसके लिए हमें सबसे पहले संदिग्ध बच्चे से संपर्क करना जरूरी है. दरअसल, यह पुष्टि करना सबसे पहले आवश्यक है कि रिपोर्ट किस बेस पर आधारित है. वास्तव में ये अन्य स्थितियों जैसे सिंकैप, माइग्रेन, टिक्स या व्यवहार संबंधी घटनाओं से संबंधित दौरे हैं या फिर कुछ और उपचार में बेहतर परिणामों के लिए यह भेदभाव जानना जरूरी है, क्योंकि गैर-मिर्गी की घटनाएं आमतौर पर एंटीपीलेप्टिक दवाओं के लिए अच्छी तरह से प्रतिक्रिया नहीं करती हैं और दरअसल, गलत डायगनोसिस के कारण ही उचित चिकित्सा शुरू करने में देरी होती है.
मिर्गी की पुष्टि करना बेहद जरूरी है, क्योंकि यह न केवल अनावश्यक उपचार और हस्तक्षेप को रोकता है, बल्कि रोगी और परिवार की चिंता और संभवतरू अनावश्यक कलंक को भी कम करता है. हम सब यह जानते हैं कि मानसिक मंदता, व्यवहार और सीखने की समस्याओं वाले बच्चों में मिर्गी की बीमारी आम है. वेस्ट सिंड्रोम और एलजी सिंड्रोम जैसी कुछ मिर्गी रोगी भी विकलांग की श्रेणी से जुड़ी हो सकती है. मिर्गी का सही निदान और इसके उपचार के साथ-साथ उचित दवा का उपयोग इसके उपचार में सबसे महत्वपूर्ण है. आमतौर पर मिर्गी का उपचार माता-पिता या दोस्तों आदि द्वारा दिए गए विवरणों पर ही आधारित होता है. ईईजी उपचार कई रोगियों में पूरक है, विशेष रूप से अक्यूट मिर्गी के साथ. मिर्गी के प्रकार के दस्तावेज के लिए वीडियो ईईजी की आवश्यकता होती है.
यह हम सब जानते हैं कि गलत डायनोसिस से सही उपचार संभव नहीं, लेकिन उचित उपचार करने से सफलता जरूर मिलती है. मिर्गी के रोगी को जानने के लिए कम से कम एक मिर्गी के दौरे की घटना के बारे में जानना जरूरी हो जाता है, जबकि यह मस्तिष्क में असामान्य रूप से अत्यधिक या अंशकालिक न्यूरोनल गतिविधि के कारण उत्पन्न होती है. वैसे, बता दें कि संकेतों और लक्षणों की एक क्षणिक घटना भी इसमें समाहित होती है. बच्चों को अजीबोगरीब दौरे, कुछ अलग-अलग तरह के दौरे, वेस्ट सिंड्रोम, एलजी सिंड्रोम आदि के कारण पड़ते हैं. फैब्राइल सीजर्स बुखार के साथ होता है और 6 महीने से लेकर 5 साल की उम्र के बच्चों को प्रभावित करता है. बता दें कि यह बुखार तीव्र कपाल संक्रमण के कारण नहीं होता. यह केवल 3 से 5 प्रतिशत बच्चों में ही होता है. वैसे, यह जानना भी जरूरी है कि एक तिहाई बच्चों में फैब्राइल सीजर्स की पुनरावृत्ति किसी न किसी रूप में होती है. एक सच यह भी है कि भारत मं मिर्गी प्रबंधन से जुड़ी एक और चुनौती यह है कि मिर्गी से पीडि़त लगभग तीन चौथाई लोगों को उस अनुपात में उपचार नहीं मिल पाता है, जिसकी उन्हें जरूरत होती है. इसे ‘ट्रीटमेंट गैप’ कहा जाता है. यह बीमारी मिर्गी-रोधी दवाओं, गरीबी, सांस्कृतिक मान्यताओं, कलंक, खराब स्वास्थ्य वितरण बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित पेशेवरों की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध संसाधनों के असमान वितरण और उपचार की उच्च लागत के लिए उपयोग या ज्ञान की कमी के कारण भी हो सकता है. भारत में मिर्गी के इलाज के अंतर की मात्रा शहरी, मध्यम-आय वाले लोगों में 22 प्रतिशत से लेकर गांवों में 90 प्रतिशत तक है.
दुनिया भर में यह अनुमान लगाया जाता है कि 15 वर्ष से कम उम्र के 10.5 मिलियन बच्चों को सक्रिय मिर्गी है, जो वैश्विक स्तर पर मिर्गी की आबादी का लगभग 25 प्रतिशत है. 3.5 मिलियन लोग, जो मिर्गी का सालाना विकास करते हैं, उनमें से 40 प्रतिशत 15 साल से छोटे हैं, और 80 प्रतिशत से अधिक विकासशील देशों में रहते हैं. मिर्गी से पीडि़त लगभग 10 मिलियन लोगों का घर भारत है. हाल ही में प्रकाशित और अप्रकाशित अध्ययनों का एक विश्लेषण भारत में मिर्गी की व्यापक प्रसार दर प्रति 1,000 जनसंख्या 5.59 पर रखता है. शहरी आबादी में 0.6 प्रतिशत की तुलना में ग्रामीण आबादी में प्रसार 1.9 प्रतिशत पाया गया है. हालांकि भारत से बहुत कम घटनाएं रिपोर्ट में आती हैं. माता-पिता के स्वास्थ्य, शैक्षिक, सामाजिक पहलुओं पर इसके प्रभाव के कारण बच्चों में मिर्गी का सही निदान करना अधिक जरूरी है. इसके अलावा, इसके सूक्ष्म अभिव्यक्तियों के कारण वयस्कों की तुलना में नवजात शिशुओं और बच्चों में गलत उपचार भी आम बात है. बता दें कि एक प्रारंभिक उपचार आपको और आपके बच्चों को मिर्गी की गंभीर जटिलताओं से बचा सकता है. सुरक्षित और स्वस्थ रहने के लिए सही समय पर सही कदम उठाएं.
प्रस्तुति: उमेश कुमार सिंह