भारत और ईरान की कला एवं वास्तुकला परंपरा में समानता तथा विविधता पर जेएमआई में तीन दिवसीय अंतर्राष्‍ट्रीय सम्मेलन

नई दिल्ली्, 06 दिसंबर 2018 : इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फाॅर आर्टस और ईरान कल्चर हाउस से मिलकर जामिया मिल्ल्यिा इस्लामिया का इंडिया-अरब कल्चर सेंटर भारत और ईरान की कला एवं वास्तुकला परंपरा, समानता एवं विविधिता विषय पर 5 दिसंकर से तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन कर रहा है। जेएमआई केएम ए अंसारी सभागार में कल इसका उद्घाटन, मुख्य अतिथि केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय के सचिव अरूण गोयल, आईएएस, ने किया और यूनिवर्सटी आॅफ मिनेसोता की कला इतिहासविद कैथराइन अशर ने मुख्य भाषण दिया। भारत में ईरान के राजदूत डा अली चेगेनी इस सत्र के विशेष अतिथि थे। ईरान के कल्चरल काउंसल्र अली देहगाई और आईजीएनसीए के कला निधि डिविजन के प्रमुख डा रमेश सी गौड़ इस मौके पर मौजूद थे।
इस सत्र की अध्यक्षता जेएमआई के रजिस्ट्रार ए पी सिद्दीक़ी ने की। सम्मेलन के संयोजक और आईएसीसी के कार्यकारी निदेशक डा नासिर रज़ा ख़ान ने इस कांफ्रेंस के विषय की जानकारी दी। रजिस्ट्रार ए पी सिद्दीक ने अपने स्वागत भाषण में इस सम्मेलन को अनूठा बताते हुए कहा कि यह बहु आयामी और बहु उद्देशीय है और भारत-ईरान संबंधों से जुड़ा है। डा अली चेगेनी ने ईरान और भारत के बीच प्राचीन काल से चले आ रहे सांस्कृतिक संबंधों को विस्तार से रखा। उन्होंने कहा कि इन रिश्तों को दोनों देशों की शायरी, भाषा, फिल्म, संगीत और यहां तक कि धार्मिक आस्थाओं तक में देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति भवन, ताज महल, जामा मस्जिद और चाहर बाग़ जैसे वास्तुकला के विश्व विख्यात नमूनों की जियोमेट्री और फूलों की नक्काशी के पैट्रन भारत और ईरान के गहरे सांस्कृति रिश्तों के द्योतक हैं।
श्री अरूण गोयल ने भी दोनों देशों के बीच प्राचीन काल से चले आ रहे सांस्कृतिक रिश्तों को बयान करते हुए कहा कि ये एक ही परिवार जैसे संबंधों को दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि इन संबंधों को सिंधु घाटी सभ्यता के समय से देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि किस तरह दोनों सभ्यताओं के बीच संस्कृत और फारसी में साहित्यिक सतत चर्चाएं होती थीं। इसी का नतीजा है कि सदियों पहले ही रामायण, महाभारत, भगवत गीता और यहां तक कि पंचतंत्र जैसी भारतीय लोक कथाओं का फारसी में अनुवाद हुआ।
विख्यात कला इतिहासविद कैथरीन अशर ने मुख्य भाषण दिया जिसका विषय था द कुतुब कामपलैक्स: ईरान एंड इंडिया। उन्होंने कहा कि कुतुब मिनार परिसर को हिन्दू-मुस्लिम सभ्यताओं के बीच संघर्ष के रूप में नहीं देखना चाहिए बल्कि इसे भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे कला एवं वास्तुकला के रिश्तों के तौर पर लेना चाहिए। डा अली देहगाई और डा रमेश सी गौड़ ने अपने विचार रखे।
-प्रेषक: मोईन अहमद खान रिपोर्ट