आज का मुसलमान और देश में बढ़ते दंगे

प्रिय पाठकों, एक सामाजिक प्राणी होने के नाते हम सब कुछ न कुछ, किसी न किसी से सिखते हैं। हमारा उठना, बैठना, बोलचाल, हावभाव सब हमें समाज ही सिखाता है। आज हम जिस एकता की बात कर रहे हैं वह कितनी जरूरी है वह हम सब बखूबी जानते हैं। एक किसान और चार बेटों का किस्सा याद करते हैं जिसमें किसान एकता के बारे बताता है कि कैसे एकता में ताकत है। यह हम जानवरों की एकता में भी देखते हैं। भीड़ से अलग हो जाने वाली बकरी को दूसरे जानवर जल्दी शिकार बना लेते हैं। यही बात हमें भी समझनी चाहिए। आखिर हम एक कब होंगे? आज हम फिरकों में, जात के नाम पर, अमीरी गरीबी के नाम पर बंटें हुए हैं जिसका फायदा कुछ शरातरी तत्व उठा लेते हैं। आज नफरत की राजनीति, नम्बर का खेल खेला जा रहा है जोकि जान लेवा बन गया है। कभी मदरसों के नाम पर, कभी लव जिहाद, गौरक्षा, सूर्य नमस्कार, राम मन्दिर, और न जाने किन किन जहरिले जुमलों से समाज में ज़़हर फेला रहे है। हम यह भी जानते हैं कि केवल चंद लोग हैं जो अपने फायदे के लिए समाज में जहर घोल रहे हैं। देश के विकास में व्यापार, धंधे, प्रापर्टी, सड़कें, पुल, पार्क बनाने में कितने दशक और कितनी मेहनत लगती है उसे ये शैतानी जहन के लोग नही समझते हैं। देश को ये लोग अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं। देश को धर्म और जातीय हिंसा की चपेट में डाल देते हैं और चंद मिनटों में दुकानें, वाहन, बाजार फूंक डालते हैं। इन सबसे न तो किसी धर्म को हानि होती है और न ही लाभ लेकिन देश जरूर कई साल पीछे चला जाता है।
अगर जरा याद करें 27 फरवरी 2002 को जब साबरमती एक्सप्रेस में 50 कार सेवकों (25 महिलाएं और 15 बच्चे) जिंदा जल गए थे। इसके बाद गुजरात के 25 में से 16 जिलों के 151 शहर और 993 गांवों में मुसलमानों पर एक योजना के तहत हमले हुए। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से इन दंगों में कुल 1044 लोग मारे गए, जिनमें 790 मुसलमान और 254 हिंदू थे। यहां मुसलमानों की होटलों, वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया। दंगों के बाद मुसलमानेां की दुकानों से सामान ना खरीदने जैसे पर्चें बांटे गए। मुसलमान मानवता प्रिय है। वह जुल्म, अन्याय के खिलाफ है। मानवता के अलावा कभी कुछ और सोच ही नही सकता। इसकी वजह अच्छे आमाल का अंत में लाभ पाना होता है।
मुसलमान ना तो नौकरियों में है, ना ही औद्योगिक घरानों में है। देश में होने वाला हर दंगा मुसलमानों का रोजगार छीनने वाला रहा है। बिहार के भागलपुर में बुनकर, भिवंडी में पावरलूम, मध्य प्रदेश के जबलपुर में बीडी, मुरादाबाद जिले में पीतल, अलीगढ़ में ताले, मेरठ में हथकरघा., यानि जहां कहीं भी दंगे हुए मुसलमानों के घर जलें, और उनके धंधे चैपट हुए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के पास सबसे ज्यादा व सबसे उपजाऊ जमीन और दुधारू मवेशी हैं। चार साल पहले जो दंगा मुजफ्फर नगर में कराया गया वह भी मुसलमानेां को कमजोर करने का हिस्सा था।
बेशक दंगे मानवता के नाम पर कलंक हैं इतने बड़े देश में विषमताएं तो स्वाभाविक है। भारत में हिंदू और मुसलमान पिछले 1200 वर्षों से ज्यादा सदभाव से एक दूसरे के दुख सुख में शरीक रहते आए हैं। यह गौर करने वाली बात है जब प्रशासन सांप्रदायिक हो जाता है तो उसका नुकसान निर्दोष, गरीब और अशिक्षित को होता है। इतिहास गवाह है कि मुसलमानों को बहुत बार निशाना बनाया गया, बहुत जान माल का नुकसान कराया गया। इसके लिए कोई भी राजनीतिक दल ने कभी भी खुल कर सामने नहीं आया है।
अगर देश को इन दंगाईयों से बचाना है तो मुसलमानों को एक होना ही होगा। यह पूरी इंसानियत के लिए अच्छा होगा। जब अच्छी सोच वाले, ईमान वाले, परमात्मा से डरने वाले लोग सत्ता में आऐंगे तो यकीनन देश, समाज और दुनिया में शांति, खुशहाली बहाल होगी। आईए सब मतभेद मिटाकर हम सब एक हो जाए।
धन्यवाद।
-मोहम्मद इस्माईल, एडीटर