गाँव और शहर का सुन्दर अनुभव एक ग्रामवासी की कलम से

प्रिय पाठको गाँव* यह शब्द मन- मस्तिष्क में आते ही शरीर में एक ताजगी की लहर दौड़ जाती है! जो लोग ग्रामीण जीवन जिए हैं उन्हें पता है कि ग्रामीण जीवन कैसा होता है! शहरी जीवन जीने वाले सिर्फ कल्पना कर सकते हैं,या किताबों में ,चलचित्रों में देख ,पढ़ सकते हैं कि ग्रामीण जीवन क्या है! ग्रामीण जीवन का सुंदर मोनोहारी वर्णन तो कोई गाँव वाला ही कर सकता है!गर्मियों की शाम का समय, गोधूलि वेला थी । पश्चिम में सूर्य अस्त हो रहा था । गली से गुजरती बैलगाड़ियों के बैलों के गले में बंधी घंटीयों से टन टन की निकलती ध्वनि मानो कानों में शहद घोल रही थी|गाँव के लोग आज भी ठंडी हवा लेने के लिये पीपल,नीम ,बरगद के पेंड़ के नीचे बैठते हैं,छाँव लेते हैं ,चौपाल लगाते हैं,एक-दूसरे की बातें सुनते हैं,परंतु शहर के लोग तो मीटिंग हॉल में भी एसी- कूलर लगाते हैं।
गाँवों में उत्सवों और मेलों की धूम होती है।यहाँ होली, बैशाखी, दीवाली, दशहरा, ईद जैसे त्योहार परंपरागत तरीके से मनाए जाते हैं।त्योहारों के अवसर पर लोग आपस में मिलते-जुलते हैं।वे लोक धुनों के नृत्य पर थिरकते हैं।
गाँव के लोग आपसी सुख- दु:ख में एक-दूसरे का पूरा साथ देते हैं।गाँव के सभी लोग आपसी भाईचारे से रहते हैं।वे आपसी विवाद को अधिकतर पंचायत में ही सुलझा लेते हैं।आज में बात कर रहा हूँ गाँव की ताजी हवा की जहाँ पर न बिजली के बिल की चिंता न पानी के बिल की न कमरे के किराये की चिंता न किसी प्रकार की कोई भगदड़ हर काम शांति से होता है| दूध ,फल,सब्जी,सभी चीजे ताजी मिलती है|दिमाग में किसी प्रकार की कोई टेंसन नहीं होती| सभी लोग अपना काम करते है और चैन की जिंदगी जीते है| सभी एक दूसरे की मदद करने के लिए तैयार रहते है|और एक मजे की बात गांव में – बी.पी., डिप्रेशन, शुगर, हार्ट अटैक जैसी बीमारी का तो पता ही नहीं होता और हसी तब आती है की गांव में बोल दो इन्फेक्शन हुआ था तो कहते है की ये कोई बीमारी नहीं है ये तो काम चोरी है | मेहनत करो आधी बिमारी वैसे ही दूर रहेगी|हम शहर के लोग दिमाग से थक जाते है और शरीर से थकने के लिए जिम जाते है |
गाँव और शहर के बीच दिलों को छू लेने वाले अंतर-
1.गाँव में घड़ी किसी किसी के पास होती है मगर समय सभी के पास ! मगर शहरों मे प्रायः लोगो के पास समय नही होता।
2. गाँव में लोगों की जेबें हल्की होती है फिर भी उनकी बातों में वजन होता है !(अर्थात लोग अपने वचन के पक्के होते है )मगर शहर मे लोगो की बाते प्रायः खोखली ही मिलतीं हैं।
3. गाँव में बच्चे एक साथ खेलना पसंद करते हैं पर शहर के बच्चे अपना समय विडियो एंड कम्प्युटर गेम्स मे बिताते हैं।
4.सुबह उठकर बच्चे, अपनों से बड़ों का आशीर्वाद लेकर ही स्कूल जाते है ,शहरी बच्चों की तरह सोते जागतेपैसे ही नहीं मांगने लगते रहते है !
5. गाँव में लोगों के पाँव चाँद पर भले ही नहीं पहुँच पाते है (अर्थात लोग तकनीक को कम समझते है), मगर मुश्किल में फँसे दोस्त के घर के दिन में चौबीस चक्कर लगाते है (लोग रिश्तों को समझते है)
6. गाँव में सभी लोगों का ऐसा मानना है कि भगवान चरित्र में बसता है ना कि चित्र में ! अर्थात हर कोई अच्छा बनने की कोशिश करता है नाकि शहर की तरह अच्छा होने का ढोंग !
7. हालंकि गाँव में शहर की तरह आधुनिक सुविधाएँ कम है मगर सूख अधिक है लोग उतने ही पैर फ़ैलाते है , जितनी लम्बी उनकी चादर होती है !
8. जाइंट फॅमिली का कल्चर अब सिर्फ गाँव में ही दिखता है शहर में तो बस बटवारे होते हैं।
9.आज भी घर के बाहर गाँव में “अतिथि देवों भव्” लिखा जाता है नाकि“कुत्तो से सावधान”।
10.गाँव में जीवन के प्रति भूख है ,जबकि शहर में सिर्फ़ रोटी ,लोग जिन्दा तो है मगर जी नहीं रहे है !
|| वक्त का ये परिंदा रुका है कहा मै था पागल जो इसको मनाता रहा
चार पैसे कमाने में आया शहर गाँव मेरा मुझे याद आता रहा ||
|| पड़ोसी पड़ोसी से बेखबर होने लगा है.
बधाई हो गाँव भी अब शहर होने लगा है।
चन्द सिक्को की मजबूरी ही है ,
जो खुद का बच्चा रोता छोड़ कर
माँ अपनी मालकिन के बच्चो को खाना खिलाने जाती है ||

दीपक निगम