भारत महान है, जहां पूरी दुनिया पल सकती है

प्रिय पाठको, आजकल देश में नागरिकता को लेकर एक नई बहस चल रही है। यह बिमारी असम में फैल चुकी है। देश के नागरिकों को यह मालूम है कि इस मुद्दे को आधार बनाकर किन लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचाया जा रहा है। असम में नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन में 40 लाख लोगों के नाम शामिल न किए जाने से पैदा हुई इस भयंकर समस्या की गंूज संसद के दोनों सदनों में पहुंच चुकी है। नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन के अनुसार असम में रहने वाले 2.89 करोड़ लोग वैध नागरिक हैं लेकिन वहां रह रहे 40 लाख लोगों की नागरिकता सिद्ध नहीं हो पाई है। इन लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने का एक मौका और दिया गया लेकिन सवाल यह है कि जब तक इस मामले में दुविधा बनी हुई है, तब तक इनका क्या होगा?

विश्व बंधुत्व, विश्व बाजार, विश्व नागरिकता, विश्व की एक करेंसी, विश्व शांति इत्यादि विचारों का क्या करें। उन सब यूएन एजेंसियों का क्या कोई मतलब है जब वे विश्व नागरिकों के मुद्दों को हल करने में असमर्थ हैं। हर नागरिक सुरक्षा के साथ अपना और अपने परिवार का भविष्य खोजता है और वहां रहना पसन्द करता है जहां उसका दिल करता है। मगर दुनिया के तमाम देशों ने बाधाएं बना रखी है। भाई-भाई अलग हुए और दुनिया के कई टुकड़े कर दिए और अब इन टुकड़ों पर रहने के लिए प्रमाण-पत्र चाहिए। नागरिकता और राष्ट्रीयता से जुड़े इस मुद्दे का हल हर राजनीतिक दल को खोजना चाहिए। पूरी दुनिया में भारत की तमाम ख़बरों को नमक मिर्च लगाकर चटख़ारे लेकर आनन्द लिया जाता है।

विदेशी नागरिकों की घुसपैठ रोकने के लिए हर देश में कानून है और यह समझना जरूरी है कि घुसपैठ कौन कर रहा है? और जिन्होंने घुसपैठ की है वह कब से रह रहे हैं और घुसपैठ रोकने के पहले से इंतजाम क्यों नहीं था। असम में ज्यादातर बंग्लादेश से घुसपैठ हुई होगी और ये लोग यकीनन अच्छे भविष्य को लेकर असम में घुसे होंगे और बस गए हैं। यह हिन्दुस्तान के लिए छोटी नहीं बहुत बड़ी समस्या है क्यूंकि यह असम में घुसपैठ नहीं पूरे देश में घुसपैठ है और बंग्लादेश के नागरिक भारत के विभिन्न राज्यों में परिवार के साथ बस गये हैं। अब म्यामार से भी कई परिवारों ने भारत में शरण ली हुई है। हमारे कई पत्रकार बंधुओं, नेताओं एवं कुछ सकीर्ण सोच वाले लोगों ने घुसपैठियों को शरण देने के बजाय उन्हें काल के मंुह में डालने के पक्ष में बात की हैं और मानवता को शर्मसार करने वाले बातें करते हैं। हम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता जी की सराहना करते हैं जिन्होंने इन गरीब लोगों के दिल को एक आशा की किरण दी है और ममता जी ने विश्व बंधुत्व और प्यार के लिए भारत की जो छवि को बनाये रखा है। भारत विश्व है जहां पूरी दुनिया रह सकती एवं पल सकती है। वे लोग आलोचना के पात्र है जो इस मुद्दे को निर्वाचन या वोट की नज़र से देखते हैं। ये जिन्दगियां हैं कोई वोट नहीं हैं। यह मसला लोगों का नहीं है दोनों देश को मिलकर हल करने का है। बांग्लादेश से चोरी-छिपे भारत की सीमा में घुस कर जो लोग असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में रोजी की तलाश के लिए सपरिवार आते हैं क्या उन्हें नहीं मालमू कि उन्हें किन परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।

जहां तक मेरे विचार या मेरी अपनी राय का सवाल है, इसमें इसमाटाइम्स के किसी अन्य सदस्य की राय का नहीं है। मैं तो हमेशा से कहता हूं कि पूरा विश्व मेरा है मेरी जेब अगर कहती है तो मैं कहीं भी रह सकता हूं और पूरे विश्व के लोग मेरे हैं, विश्व के हर नागरिक का दर्द मेरा है। हमसे अगर हो सके तो हमें हर परेशान की मदद करनी चाहिए। इस मुद्दे को मानवता के अलावा और कोई दूसरी नज़र से देखना घृणित अपराध है। आज हम सभ्यता की बात करते हैं, कौनसी सभ्यता चल रही है? पढ़े लिखे अनपढ़ों की सभ्यता जो इंसान को इंसान न समझे, क्या मानवता का ख़ून दुनिया में नहीं किया जा रहा है? हम कैसे सभ्य युग में रह रहे हैं? जहां सब समर्थ हो रहे हैं और रिश्तों, नातों और प्यार, मोहब्बत और इंसानियत से दूर होते जा रहे हैं।

आईये, मानवता के लिए सभी को गले लगाएं और घुसपैठ जैसे इन विषयों को दोनों देश की सरकारों को सुझलाने दीजिएं।  धन्यवाद।

-मो. इस्माईल, एडीटर