दुल्हा बिकता है खरीदोगे-दहेज एक सामाजिक बुराई

प्रिय पाठको, बहुत ही चिन्ता का विषय है कि दहेज उत्पीड़न के मामले हर साल बढ़ रहे है। धन-पशुओं को उस ईश्वर, पालनहार ने काफी दिया है मगर इनकी भूख नहीं मिट रही है जिसके लिए ये धन-पशु अपने बेटों को बली का बकरा बनाते हैं और उसकी किमत ध्यान में रखकर वधू ढूंढ़ते हैं। हैरानी की बात ये है कि दहेज के लिए वर पक्ष वधू पक्ष से डील करता है या कुछ अपना पक्ष शादी होने के बाद में वधू पक्ष पर कई तरीकों से दबाव डाल कर दहेज हासिल करने की कोशिश की जाती है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है या हमारे समाज के उन नीच सोच वाले धन-पशुओं का पाप है जो हराम के माल को हलाल समझते हैं। महिलाओं की रक्षा करने वाला, अपनी बहनों को राखी बांधने वाला क्या इतना नामर्द हो सकता है कि वह अपनी एक अर्धान्गनी का पेट भरने में असमर्थ है और अपने कमजोर, असहाय, बूढ़े सास-ससूर को जो अपने कलेजे के टुकड़े के लिए एक चैकीदार की तरह हर धूप-छांव में बादल की तरह साया बना रहा, फिर उसने अपनी लाडली के हाथ पीले करने के चक्कर में कसाईयों के हवाले लाल करने दे दिया। सरकार के कड़े कानून बनाने के बावजूद आज भी खुलेआम दहेज लिया और दिया जा रहा है। वह कभी गिफ्ट नहीं हो सकता जिसके लिए भाई लोन लेता है, मां-बाप खून के आंसू बहाते हों।
वर के नौकरी या कारोबार, धन्धे के हिसाब से कैश, जेवर, जमीन और वाहनों की मांग की जाती है। कपड़ा, फर्नीचर, इलैक्ट्रोनिक चीजें तो साथ में आते ही हैं। ख़ाना, रेस्टोरेंट और तमाम खर्चे देखकर गरीब आदमी कभी अपनी तो कभी अपनी लड़कियों को देखता है और बद्दुआ करता है कि कभी गरीब की बेटी न हो।
कुछ वर पक्ष यह कहते हैं कि माल का क्या करना है भगवान की कृपा से माल सामान हमारे घर काफी है तुम बस अपने लड़के याने वर के नाम इतना केश डाल दो। देखने में अक्सर यह आया है कि जिस घर में चार लड़के हो और जाहिर है बहुओं के साथ कम ज्यादा दहेज जरूर आऐगा। अब इन घरों में एक दूसरे पर तानाकशी और छिटाकशी होगी, नाइत्त्फाकी और नफरत बढ़ेगी, झगड़े होंगे और फिर लड़की पर दहेज के लिए ज़ोर डाला जाऐगा। हद तो तब हो जाती है जब दहेज के लिए तरह-तरह के दबाव बनाकर लड़की को मरने पर मज़बूर किया जाता है। सख़्त कानून के बावजूद लोगों को डर नहीं है कि हम क्या कर रहे हैं? आज भी बहुओं के साथ पशुओं जैसा व्यवहार किया जाता है।
हम नये जमाने में अपने आप को सभ्य, शिक्षित, उच्च विचारों वाला अच्छा इंसान कहते हैं। समाज में औरतों ने औरतों को नकारा है, और औरतों ने ही हर बिमारी को बढ़ाया है। औरतों की बात आज भी घरों में सुनी जाती है और औरतें अपनी हटधर्मी की वजह से ज्यादातर फैसलों को मनवा लेती हैं। इसलिए समाज में सभी औरतें नई बहुओं को अपनी बेटी समझे और बेटी की तरह रखें।
अब सवाल यह है कि क्या इस बुराई का कोई हल है? क्या इसके लिए पहले कोई आवाज नहीं उठी? यह समाधान समाज से कभी नहीं होगा। इसके लिए कठोर कानून बनाने होंगे, निगरानी और मुखबिर छोड़ने होंगे जो तुरन्त इन बुराईयों की ख़बर पुलिस तक पहुंचा सके और तुरन्त अपराधियों पर कार्यवाही की जा सके और साथ ही इसके लिए सामाजिक संस्थाओं को सरकार के सहयोग से मिलकर जागरूकता अभियान भी चलाना चाहिए।
शादी को आसान बनाने के लिए दहेज को ना कहें ताकि गरीबों की बेटियों की भी शादी हो सके। दिखावा करना, फिजुलखर्ची करना, बगैर जरूरत चीजें जमा करना या खरीदना, गुनाह है, पाप है जो की शादियों में ज्यादा होता है। हमारा काम है अच्छाईयों को बताना, मानना न मानना व्यक्तिगत है। याद रखें, हरेक को मरना जरूर है और जहां हम हैं वह आख़िर नहीं है। संतुष्टि किसी ने नहीं पाई, तमाम सुखों का एक दिन अंत है। बदतरीन इंसान वह है जो किसी के दिल को दुखाए। धन्यवाद।
-मो. इस्माईल