बेहतर स्वास्थ्य स्थितियों के लिए डॉक्टर और मरीज के बीच समझदारी जरूरी हैः उपराज्यपाल अनिल बैजल

नई दिल्ली, 26 मई, 2018ः चिकित्सकों तथा स्वास्थ्य कर्मियों के खिलाफ हिंसा पर तत्काल रोक लगाए जाने और इसके लिए केन्द्रीय कानून बनाए जाने की मांग करते हुए, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने आज राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जिसका उद्घाटन दिल्ली के उपराज्यपाल माननीय श्री अनिल बैजल ने किया।
उपराज्यपाल ने चिकित्सकों को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘मानवता की सेवा करने के मामले में चिकित्सा का पेशा शीर्ष पर है, लेकिन बदलते समय के साथ डॉक्टर और रोगी के संबंध में काफी बदलाव हो रहे हैं। चिकित्सकों एवं मरीजों के बीच बेहतर समझदारी तथा मरीजों से यथार्थवादी अपेक्षाएं होने पर ही मरीजों के प्रति डाक्टरों की सहानुभूति बढ़ेगी और साथ ही साथ डॉक्टर और रोगी के संबंधों में सुधार होगा। चिकित्सकों एवं मरीजों के बीच बिगड़ते संबंधों के लिए युवा पीढ़ी में क्रोध और गुस्सा के साथ आक्रामकता और अधीरता पूरी तरह जिम्मेदार है।’’
उन्होंने कहा कि चिकित्सा आज भी एक आदर्ष पेशा है, लेकिन डॉक्टरों के प्रति विश्वास को बहाल करने की जरूरत है। मरीजों और डाक्टरों के बीच के संबंधों में सहमति मुख्य भूमिका निभाती है और आज के समय में इस रिष्ते को बहुत ही नाजुक तरीके से संभालने की जरूरत है। आज जरूरत इस बात की है कि नैतिकता के मजबूत आचार संहिता का अनुपालन सख्ती से हो और इससे ही न्याय को सुनिष्चित किया जा सकेगा। इस सम्मेलन का जो थीम है वह आज के समय में बहुत ही प्रासंगिक है और इससे इस समस्या का समाधान करने में मदद मिलेगी।
उप राज्यपाल श्री बैजल ने कहा, ‘‘यह जोरदार ढंग से बताये जाने की जरूरत है कि समाज में हिंसा की कोई जगह नहीं है और रोगियों और उनके परिवारों द्वारा चिकित्सकों को किसी प्रकार की धमकी दिए जाने को किसी भी रूप से सही नहीं ठहराया जा सकता है। हाल के एक वैश्विक अध्ययन के मुताबिक, भारत में चिकित्सक मरीज को देखने और डाक्टरी पर्चा लिखने में दो मिनट से भी कम का समय देते हैं। इतने कम समय में डॉक्टर और मरीज के बीच कोई सार्थक संबंध स्थापित नहीं हो सकता है। यह आज की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है जिसेे हल करने की जरूरत है।’’
आईएमए ने चिकित्सक समुदाय के खिलाफ किसी तरह की हिंसा के लिए ‘‘शून्य सहनशीलता’’ का संकल्प लिया है और डॉक्टरों, नर्सों और अस्पताल कर्मचारियों पर होने वाले अकारण और शर्मनाक अमानवीय हमलों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
आईएमए के राश्ट्रीय अध्यक्ष डाॅ. रवि वानखेडकर ने कहा, ‘‘भारत में चिकित्सक एवं स्वास्थ्य कर्मी हिंसा के कारण सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। निःसंदेह कार्यस्थल पर तनाव के कारण चिकित्सा की गुणवत्ता और अस्पताल के भीतर मरीजों की भर्ती की स्थिति को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। डॉक्टर अपने कार्यस्थल में भयभीत वातावरण में रह रहे हैं। मरीजों की देखभाल के अपने प्रोफेषनल काम को अंजाम दे रहे हैं लेकिन इसके बावजूद स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने वाला समुदाय गुस्से में है। इन सबके कारण इस बात का खतरा है कि अस्पतालों में गंभीर मरीजों का इलाज करने से इंकार कर दिया जाए और यह देश के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होगा।’’
उन्होंने कहा कि चिकित्सा समुदाय के खिलाफ हिंसा के मूल कारण जटिल हैं और जरूरत इस बात कि है कि सभी संबंधित पक्ष इसका समाधान मिलकर करें और इसमें सरकार को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। हालांकि हमारा चिकित्सा समुदाय मरीजों को चिकित्सा प्रदान करने की जिम्मेदारी का वहन कर रहा है लेकिन सरकार को चिकित्सा सेवा करने वालों की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी लेनी होगी।
आईएमए के पूर्ण राश्ट्रीय अध्यक्ष डाॅ. विनय अग्रवाल ने कहा, ‘‘भारत की स्थिति एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है और सरकार को एक मजबूत और प्रभावी केंद्रीय चिकित्सा अधिनियम लाकर इसमें तत्काल हस्तक्षेप करने की आवष्यकता है। 17 राज्यों में डॉक्टरों और अस्पतालों पर हिंसा के खिलाफ कानून हैं। लेकिन इसके खराब कार्यान्वयन, पुलिस कर्मियों के अपर्याप्त ज्ञान, कमजोर अधिनियमों आदि के कारण इन राज्यों के मेडिकेयर एक्ट पूर्ण रूप से अप्रभावी हैं। मेडिकेयर एक्ट की खराब और अप्रभावी स्थिति को दूर करने के लिए तुरंत केन्द्रीय कानून बनाया जाना जरूरी है।’’
आईएमए के महासचिव डाॅ. आर. एन. टंडन ने कहा, ‘‘आईएमए ने नैतिक तौर-तरीकों, रोगियों और रिश्तेदारों के साथ स्वस्थ संवाद और आरोपों में पारदर्शिता, अस्पताल परिसर में सलाहकार आदि जैसे नैतिक व्यवहारों की वकालत की है। रोगी सहायता समूह, शिकायत निवारण तंत्र, रोगियों के अधिकार और जिम्मेदारियांे को लागू किया जा रहा है। लेकिन किसी भी कीमत पर चिकित्सक समुदाय के खिलाफ हिंसा सभ्य समाज में स्वीकार नहीं की जा सकती है। आईएमए हिंसा का मुकाबला करने के लिए अपने समुदाय की ओर से ‘‘प्रतिक्रिया, जवाब, नियमन और पहुंच’’ की नीति की वकालत करता है।’’