आईसीआईसीआई द्वारा वित्तीय अनियमितताओं की सीबीआई जांच हो और दोषियों को अविलंब गिरफ्तार किया जाए

नई दिल्ली, 9 अप्रैल, 2018, डॉ. उदित राज, सांसद, उत्तर पश्चिम दिल्ली, ने आज प्रेसवार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि आई.सी.आई.सी.आई. बैंक एवं उनकी सहायक कंपनी आई.सी.आई.सी.आई. लुंबार्ड में जो भी वित्तीय अनियमितताएं एवं भ्रष्टाचार की जानकारी मिली है, वह समाज के अनसूचित जाति/जन जाति एवं ओबीसी के हितों से ज्यादा संबंधित हैं। इस प्रकरण में जो मुख्य बिन्दु उभरकर सामने आए हैं, वे इस प्रकार हैं –
1. कपड़ा मंत्रालय भारत सरकार द्वारा प्रायोजित ‘राजीव गांधी शिल्पी स्वास्थ्य बीमा योजना’ के अंतर्गत 2009-2010 में 30 हजार वस्त्र-शिल्पियों का रजिस्ट्रेशन किया गया, जिसमें से 11,445 अवैध पाए गए। इस तरह की घटनाएं पश्चिम बंगाल, असम, उत्तर प्रदेश, मणिपुर एवं अन्य राज्यों में भी हुईं। जब राजस्थान में मामले सामने आने लगे तो कुछ रकम मंत्रालय को आंशिंक रूप से लौटा दी गयी।
2. श्रीगंगानगर, राजस्थान में कृषि बीमा योजना के अंतर्गत कुल 3158 किसानों को पंजीकृत किया गया, जिसमें से 2093 अवैध पाए गए। मामले जब सामने आए तो बजाए रकम लौटाने के यह रकम तमाम अवैध पंजीकृत किसानों को क्लेम भुगतान के रूप में फर्जी तरीके से दिखा दिए गए। सालाना दिए जाने वाले 75 करोड़ प्रीमियम में से 50 प्रतिशत राशि फर्जी होने का अनुमान है।
3. इसी तरह राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना में भी राजस्व के भारी नुकसान का अनुमान है।
4. महाराष्ट्र और उ.प्र. सरकार द्वारा किसानों के लिए प्रायोजित व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा के अंतर्गत वास्तविक लाभार्थियों को क्लेम का भुगतान नहीं किया गया है। उ0प्र0 में 5 हजार क्लेम किए गए थे, जिसमें मात्र 1500 का निबटारा हुआ। पुनः महाराष्ट्र में 4500 क्लेम में से मात्र 800 क्लेम का भुगतान किया गया। जो बीमा दावे निरस्त किए गए, उनका कोई आधार नहीं था।
5. इस प्रकार से कुल 1 हजार करोड़ से ऊपर के राजस्व चोरी का अनुमान है।
मैं 2013 से पद्मश्री श्रीमती चंदा कोचर एवं उनके द्वारा संचालित आई.सी.आई.सी.आई. के खिलाफ लगातार लिखते आया हूं, जिसकी शुरुआत 5 अक्टूबर 2013 में वित्त राज्यमंत्री श्री नमोनारायण मीना जी को लिखे पत्र से हुई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री, डॉ. मनमोहन सिंह को भी पत्र लिखकर इस मामले से अवगत कराया गया था। इसके अलावा इस पत्र की प्रति आई.आर.डी.ए., आर.बी.आई. आदि को भी भेजी गयी थी।
उसके बाद आर.के. नायर, तत्कालीन सदस्य आई.आर.डी.ए., ने भी अविलंब जांच के आदेश दिए एवं बाद में एक छोटी रकम का जुर्माना लगाकर इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। बाद में आर.के. नायर को आई.सी.आई.सी.आई. ग्रुप के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में शामिल कर लिया गया।
आई.सी.आई.सी.आई. द्वारा वित्तीय अनियमितताओं का सिलसिला यही नहीं रूका बल्कि उनके सहायक कंपनी आई.सी.आई.सी.आई. प्रोडेन्सियल ने भी इसी तरह की अनियमितताओं के चलते एक विसिल ब्लोवर सुनील बालचंदानी, जो उसी कंपनी में कार्यरत् थे, ने जब आई.सी.आई.सी.आई बैंक प्रबंधन को आगाह किया कि गरीब किसानों का उनके बचत खातों में जमा धनराशि को बिना इजाजत के बीमा पॉलिसी बना दी गयी है, तो सुनील बालचंदानी की बात को अनदेखा ही नहीं किया गया बल्कि नौकरी से त्यागपत्र देने के लिए भी बाध्य किया गया। इस प्रकरण में बहुत से गरीब किसानों की जमापूंजी बैंक ने नाजायज तरीके से जब्त कर ली। इस तरह से इनका शोषण हुआ।
चूंकि ये सारे मामले समाज के गरीब, किसान, मजदूर एवं पिछड़े वर्ग के हित से संबंधित हैं, इसलिए मैंने गरीबों एवं शोषितों के जख्म पर मरहम लगाने के लिए मुंबई हाई कोर्ड में जनहित याचिका दायर की ताकि आई.सी.आई.सी.आई लुंबार्ड द्वारा गलत तरीके से वसूले गए धन को जब्त करके इस लूट को रोका जा सके। मैंने केन्द्रीय जांच एजेंसी को भी लिखकर आगाह किया है कि कैसे श्रीमती चंदा कोचर की अगुवाई वाली कंपनी आई.सी.आई.सी.आई. ग्रुप हमारे वित्तीय सिस्टम का गलत फायदा उठाकर इस गतिविधि में शामिल रही हैं। इन तमाम आरोपों से बरी होने के लिए चंदा कोचर एवं उनके आई.सी.आई.सी.आई. ग्रुप ने मणिलाल अंबालाल खेर नामक लॉ फर्म को इस मामले में अपना अधिवक्ता नियुक्त किया।
इस लॉ फर्म ने कालांतर में अपने दो अधिवक्तओं वीरेन्द्र सर्राफ और चेतन कपाड़िया एवं तत्कालीन बाम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मोहित शाह के साथ मिलकर इस याचिका से श्रीमती चंदा कोचर का नाम हटवा दिया। ऐसे भी प्रमाण हैं कि वीरेन्द्र सर्राफ एवं चेतन कपाड़िया के खिलाफ गंभीर आपराधिक मुकदमें बांबे हाई कोर्ट के समक्ष लंबित हैं।
मैंने यह मामला लोक सभा में कई बार अतारांकित प्रश्न के दौरान उठाया है लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि श्रीमती चंदा कोचर की पकड़ हमारे सिस्टम में इतनी मजबूत है कि मेरे अथक प्रयासों के बावजूद भी अब तक इनके विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं हुई। टी.एस. विजयन जो तत्कालीन आई.आर.डी.ए. के चेयरमैन थे, उन्होंने गलत तथ्य देकर कई बार संसद को भी गुमराह किया और जांच एजेंसियों को भटकाया।
मेरे नेतृत्व वाले अनुसूचित जाति/जन जाति संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ द्वारा एक आपराधिक याचिका 4936/17 दिसंबर 2017 में बांबे हाई कोर्ट के समक्ष पूरे साक्ष्य के साथ दायर कर दिया है, साथ ही केन्द्रीय जांच एजेंसी की मुंबई शाखा को भी सारे दस्तावेज सौंप दिए गए हैं।
भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी अनीस प्रसाद जो जयपुर में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक थे, उन्होंने आई.सी.आई.सी.आई. लुंबार्ड के खिलाफ प्राथमिक जांच के आदेश दिए एवं आई.सी.आई.सी.आई. लुंबार्ड के कार्पोरेट ऑफिस में छापेमारी भी की। इस बीच अनीस प्रसाद का तबादला अन्यत्र कर दिया गया। न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए केस बंद करने का आदेश यह कहते हुए दिया कि स्थानीय पुलिस इस मामले की जांच करेगी। ऐसा प्रतीत होता है कि नीरव मोदी प्रकरण के पश्चात् हमारे वित्तीय संस्थान पहले से ज्यादा दुरूस्त हो गए हैं और इस मामले में आई.सी.आई.सी.आई. ग्रुप नागरिकों एवं सरकार को अब और आगे गुमराह नहीं कर पाएगी।
जब तक आई.सी.आई.सी.आई. बोर्ड भंग नहीं किया जाता तब तक इस मामले में निष्पक्ष जांच संभव नहीं है। अतः हम मांग करते हैं कि इसके बोर्ड को भंग करते हुए श्रीमती चंदा कोचर सहित इसमें शामिल अन्य दोषियों को अतिशीघ्र गिरफ्तार करके जांच शुरू की जाए ताकि इनके द्वारा सताए गए शोषितों एवं गरीबों को न्याय मिल सके।