किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में ‘‘आओ गढ़ें संसकारवान पीढ़ी‘‘ (गर्भोत्सव संस्कार) विषय पर व्याख्यान

लखनऊ, 08 मार्च, 2018ः किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के कलाॅम सेंटर में दिनांक 08 मार्च, 2018 को ‘‘आओ गढ़ें संसकारवान पीढ़ी‘‘ (गर्भोत्सव संस्कार) विषय पर अतिथि व्याख्यान का सफल आयोजन सम्पन्न हुआ। उपरोक्त व्याख्यान डाॅ0 संगीता सारस्वत, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार द्वारा दिया गया। डाॅ0 संगीता ने कहा कि वर्तमान में गर्भोत्सव संसकार की जरूरत इसलिए पड़ी है कि आज का भौतिकवादी विज्ञान हमें ऐसे मोड़ पर ले आया है जहंा हम जिस डाल पर बैठे है उसी को काट रहे है। इंसान की मूलभूत जरूरत भोजन, जल, एवं वायु है किन्तु आज हमने इसे इतना प्रदूषित कर दिया है कि यह हमें ही बीमार बना रही है। तनाव आने वाले समय मंे पूरे विश्व में महामारी होगा। आज मानव प्रजाति पर न्यूक्लियर युद्ध की तरह ही एंटी माइक्रोबियल रजिस्टेंस का खतरा बढ़ गया है। आज के समय में हम आईक्यू को बहुत महत्व देते है किन्तु जब तक इसके साथ विवेक, प्रज्ञा नहीं आए तब तक इसका कोई उपयोग नही है।
वर्तमान समय में अध्यात्म एवं विज्ञान में तालमेल बैठाना बहुत ही महत्वपूर्ण हो गया है। आने वाला समय अध्यात्मिक विज्ञान का होगा। कई जगहों पर अध्यात्मिक कार्यों में जप किए जाने वाले मंत्रों के ऊपर यह शोध चल रहा है कि वह मनुष्य पर क्या असर डालते हैं। उसी क्रम में गायत्री मंत्र के ऊपर भी एक शोध किया गया है। ऐसे मरीज जिनका ब्लड प्रेसर असमान्य रहता हो उनको लगातार एक महीने तक गायत्री मंत्र का जाप करा कर उनको इसीजी, एवं ब्लड प्रेसर को मानिटर कर के देखा गया तो उनके ब्लड प्रेसर और तनाव कम हो गया था। संस्कार की पद्धति श्री विष्णु द्वारा प्रदान की गई है। यह एक अध्यात्मिक चिकित्सा प्रणाली है जो हमारे विकारों को दूर करती है, इससे मानवीय चेताना उन्नती करती है। माइंड को तीन भाग में बाटते है सब काॅन्शियस माइंड, काॅन्शियस माइंड, सुपर काॅन्शियस माइंड। सब काॅन्शियस माइंड का विकास गर्भावस्था से जन्म के पांच वर्ष तक होता है। अध्यात्मिक दृष्टिकोण से मानव शरीर को तीन भागों में बाटा गया है। कारण शरीर, सुक्ष्म शरीर एवं स्थूल शरीर। हम आज स्थूल शरीर के प्रदूषण की तो बात करते हैं किन्तु सुक्ष्म एवं कारण शरीर के प्रदूषण की बात नही करते है।
डब्ल्यूएचओ द्वारा स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, समाजिक एवं अध्यात्मिक स्वास्थ्य के रूप में परिभाषित किया जाता है। किन्तु आज हम केवल शारीरक स्वास्थ्य पर ही ध्यान देते है। मानव का प्रथम संस्कार गर्भ संस्कार होता है। गर्भोत्सव संस्कार गर्भ विज्ञान का एक अध्यात्मिक समाजिक एवं मानोवैज्ञानिक शिक्षण है। गर्भवती का चरित्र उत्तम, विचार उत्तम होना चाहिए जिससे वो एक उत्तम चरित्र के शिशु को जन्म देती है। ईश्वर ने औरतो को इतनी शक्ती प्रदान की है कि वो जैसा चाहे वैसा महान संतान पैदा कर सकती है। किन्तु आज हम अपनी संतान को डाॅक्टर, इंजीनियर बनाना चाहेते है उसे महान नही। माॅ की इच्छा शक्ती शिशु के जेनेटिक्स में भी बदलाव ला सकती है। गर्भावस्था के दौरान जैसे गर्भवती के विचार एवं भावनाएं होती है उसी प्रकार का हार्मोंस उसके शारीर मे निकलता जिससे गर्भस्थ शिशु के उपर भी प्रभाव पड़ता है। माॅ खुश एवं प्रसन्नचीत रहेगी तो उसके शरीर में अच्छे हार्मोंस निकलेंगे और इससे बच्चें का व्यवहार भी अच्छा होगा। गर्भ धारण प्लान करके करना चाहिए।
गर्भ धारण करने से पुर्व ध्यान और साधना शुरू करने से प्रेगनेंसी अच्छी होती है। मां के गर्भ में ही बच्चा स्वाद, महक और आवज आदि को पहचानने लगता है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान गर्भवती के आसपास का माहौल सौहार्दपूर्ण एवं स्वस्थ होना चहिए, लड़ाई झगड़ा नही होना चाहिए। गर्भ संस्कार के समय गर्भवती को का उच्चारण करना चाहिए और अपने बच्चे से स्वस्थ संवाद स्थापित करना चाहीए। गर्भावस्था के दौरान और गर्भावस्था के पश्चात् शब्दांे के प्रभाव से हम बच्चों की क्षमता को खत्म कर देते है। बहुत से ऐसे माता पिता होते है जो अपने बच्चों को यह कहते है कि तुम कुछ नही कर सकते इस प्रकार वो अपने बच्चे की योग्यता एवं उसकी क्षमताओं को खत्मकर देते है। गर्भावस्था के दौरान माता जिस भाषा, विद्या पर ध्यान देती है वो भाषा या विद्या शिशु आसानी से सीख जाता है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान गर्भवती को नियमित स्वस्थ जीवनचर्या का पालन करना, योगासन करना, जप, ध्यान, प्राणायाम एवं अच्छी किताबों का अध्ययन करना चाहिए।
अगर आप स्वामी विवेकानंद की तरह पुत्र चाहते है तो गर्भावस्था के दौरान उनकी बायोग्राफी को मन से ध्यान लगाकर पढ़े। हर गर्भवती को चार धण्टें अच्छी बातें सीखनी चाहिए, गूंजने वाले संगीत सुनना चाहिए, गर्भवती के आस-पास प्रसन्न, स्वस्थ एवं सकारात्मक वातावरण बनाना चाहिए, डरावनी तथा नाकारात्मक बातें न करें। गर्भवती को निःस्वार्थ सेवा का भाव रखना चाहिए इससे सकारात्मक विचार उत्पन्न होते है।
कार्यक्रम में मा0 कुलपति प्रो0 मदनलाल ब्रह्म भट्ट जी ने कहा कि यह अतिथि व्याख्यान नर्सिंग के विद्यार्थियों, मेडिकल विद्यार्थियों एवं स्त्री एवं प्रसूती रोग विशेषज्ञों के लिए खास तौर से आयोजित किया गयाहै। ताकि वो समाज के दूसरे लोगो को इन संस्कारों के विषय में ज्ञान दे सके। सभी धर्मो में मृत्यु एवं जन्म दो अटल सत्य है। मनुष्य जीवन मे विभिन्न संस्कारों को अपनाया जाता है। हम शिशु के जन्म से पहले केवल गर्भवती के न्यूट्रिशियन के अलावा अन्य बातों पर ध्यान नही देते है। गर्भ संस्कार जीवन का सबसे पहला संस्कार होता है और इसका इतना महत्व है कि गर्भवस्था के संस्कार व्यक्ति पर जीवन पर्यंत असर डालता है। गर्भ के दौरान जैसा वातावरण होता है उसी के अनुसार गर्भ में पल रहे शिशु का निर्माण होता है। इसलिए आवश्यक है कि हम गर्भावस्था के दौरान उचित वातावरण का विकास करें।
इस अवसर पर प्रो0 विनीता दास, अधिष्ठाता, चिकित्सा संकाय, प्रो0 मधुमती गोयल, अधिष्ठाता नर्सिंग संकाय, प्रो0 विनोद जैन, अधिष्ठाता, पैरामेडिकल संकाय सहित विभिन्न संकायो के संकाय सदस्य, विद्यार्थी उपस्थित रहे।

Afzal Ali Shah Maududi.