गणतंत्र दिवस के दिन कासगंज से देश को एक पैग़ाम

प्रिय पाठको,
26 जनवरी के दिन पूरा देश गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय पर्व को बड़े उल्लास के साथ मना रहा था, मगर देश के कुछ असामाजिक तत्वों ने कासगंज में बहुत बड़ा आंतक करना चाहा। यहां से देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के अंदर भय उत्पन्न करना था। मगर इन मुट्ठी भर लोगों को यह मालूम नहीं है कि यहां ज्यादातर हमारे हिन्दू भाई अपने पड़ोसी, अपने सहकर्मी के साथ बहुत ही प्यार से रहते हैं। आज से पहले कभी हमें यह मालूम नहीं था कि हम किसी हिन्दू के साथ रह रहे हैं। खुद मुझे अपने दोस्तों के साथ 20 साल से ज्यादा एक साथ व्यवसाय करते हुए हो गए और अगर मैं यह कहूं कि मुझे अपने हिन्दू दोस्तों पर ज्यादा यकीन होता है। तो फिर यह कौन से शैतान की औलादें हैं जो हमारे आपस के प्यार में ज़हर घोल रहे हैं।
प्रिय पाठको, जब भी कोई जुलुस की शक्ल में भीड़ सड़कों पर निकलता है तो एक डर, एक भय का माहौल बन जाता है। क्या पुलिस प्रशासन को इन घटनाओं की जानकारी नहीं होती? इन जैसे तमाम रैलियों पर प्रतिबंध लगना चाहिए।
क्या कासगंज या दूसरी जगहों में जो उपद्रव कराए जा रहे हैं उनके पिछे के राज को देशवासी नहीं समझ रहे हैं। देश के दूसरे दल इन घटनाओं पर मौन क्यूं हैं। यह कोई भी समझदार समझ सकता है। हमने हालही में हुए उपचुनावों में यह देखा है कि राजस्थान की जनता राज्य के अंदर अल्पसंख्यकों के प्रति बढ़ रहे आतंक से खुश नहीं है। मानवता प्रिय लोग इंसानियत का ख़ून होते नहीं देख सकते। आज जो दल यह समझते हैं कि आपस में एक दूसरे को लड़ाकर सत्ता तक पहुंचा जा सकता है तो उनका यह भ्रम बहुत जल्द अपने अंत को पहुंचेगा। देश ने यह भी देखा है कि मीडिया और सरकारी तंत्र सिर्फ एकतरफा काम कर रहा है। लोग जान रहे हैं कि टेलीविजन चैनलों पर बैतुकी बहस से कोई हल निकलने वाला नहीं है। आज ज्यादात्तर लोग सोशल मीडिया पर यकीन करते हैं। सोशल मीडिया से लोगों को देश और दुनिया की सारी जानकारी मिल जाती है। लोगों का टेलीविजन चैनलों से मोहभंग हो गया है। बिके औरी साम्प्रदायिक होने के कारण आज बड़े मीडिया हाउस की ख़बरों पर यकीन नहीं किया जा रहा है।
जहां तक देश में माहौल खराब करने का सवाल है उसमें अल्पसंख्यक समाज का कभी भी हाथ नहीं रहा है। यह जरूर है कि हर बार गरीब, मज़लूम, बेरोजगार को अपने स्वार्थ के लिए निशाना बनाया जाता रहा है। खेद का विषय यह है कि तमाम विपक्ष दल सरकारों के ज़ुर्म, ज्यादतियों एवं अन्याय को नज़रअंदाज किये हुए हैं।
आज यह हम सब जानते हैं कि देश में बेरोजगारी है, मंहगाई है, किसान परेशान है, ठेके पर काम करने वाले तमाम लोग परेशान हैं। बजट 2018-19 में ऐसा कुछ नहीं है जिससे खुश हुआ जाय। जनता शायद देश के भविष्य को नहीं देख रही है। आज देश में असामाजिक तत्व भय, अशांति बना रहे हैं उसके पिछे राजनीतिक लाभ है। क्या यह उचित है कि एक जाति धर्म के लोगों के अन्दर डर पैदा करना। जब 150 बाईकों पर भड़काऊ नारे लगाते हुऐ, हाथों में डंडे और बंदूक लिए एक संप्रदाय को डराने निकलेंगे, तो क्या यह अच्छा है? क्या अल्पसंख्यक आजाद भारत में चैन की सांस ले रहे हैं?
आज मुसलमान जो कि देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक हैं उसको किसी भी धारा में नहीं लिया जा रहा है। बहुत अच्छा है या बहुत बुरा है, यह समझ-समझ का फेर है। देश में माहौल अच्छा करने के लिए सभी धर्मों से एक सोच वाले लोग आगे आकर अपने-अपने समाज में बताएं कि इंसानियत के लिए इंसान बनों आपस में न लड़ो। इससे पूरी दुनिया में देश की थू-थू होती है और इससे देश का दुष्प्रचार हो रहा है।
इन घटनाओं के पैदा होने का एक राजनीतिक लाभ और दुसरा कारण मेरी समझ में आता है कि इन लोगों का पेट भरा हुआ है अगर इन लोगों को भूख होती तो ये लोग अपनी रोज़ी की ख़ोज में लगे रहते। तिसरा कारण इन लोगों को प्रशासन का कोई डर नहीं रहा।
देश के प्यारे देशवासियों से हम अपील करते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सपने, सबका साथ सबका विकास को साकार करने के लिए सभी धर्मों का आदर करें, एक दूसरे का सहयोग, सहायता करें। आओ मिलकर एक सुन्दर सपना देखें। सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा।
-मुख्य संपादक मोहम्मद इस्माईल