नाकारों (नीच मानसिकता) ने हमें क्या परोस रखा है…

प्रिय पाठको, नाकारों से मुराद मीडिया और सरकारी तंत्र हैं और देश की जनता मूक दर्शक है। सभी अपनी-अपनी रोजी की खोज में जैसे रोज जानवर निकलते हैं और सांय होते अपने-अपने बिलों में घुस जाते हैं। पहले हम समाचार की बात करते हैं। अभी हाल ही में हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी दावोस स्विटजरलैंड में भाग ले के आए हैं। पीएम मोदी 21 साल बाद दावोस जाने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं। इससे पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री देवगौड़ा जी ने दावोस सम्मेलन में भाग लिया था। इस बैठक में करीब 2500 लोग हिस्सा लेते हैं। दावोस में वैश्विक विकास के लिए फैसले लिए जाते हैं। पांच दिन तक चलने वाली इस 48वीं बैठक में व्यापार, राजनीति, कला, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों से कई नामी हस्तियांे ने भाग लिया। भारत की ओर से पीएम मोदी समेत लगभग 125 लोग इस सम्मेलन में शामिल हुए। यहां उन्हांेने अपने भाषण में जो कहा उस पर उनकी बड़ी निंदा हो रही है। उनके एक वीडियो क्लिपिंग की बहुत चर्चा हो रही है, जिसमें उन्होंने कहा है कि भारत की 600 करोड़ की जनता ने हमें 2014 में वोट दिया था जबकि भारत की कुल जनसंख्या ही 125 करोड़ के लगभग है। यह इसलिए बुरा है कि पूरी दुनिया देश के प्रतिनिधि हमारी बात को तोल रहें होते हैं। देश का नेतृत्व कौन कर रहा है? क्या बोल रहा है? दरअसल हमें हम से ज्यादा दुनिया जान रही है। हमारे यहां गाय की राजनीति, धर्म जाति की राजनीति, भेदभाव, और कितने असामाजिक संगठन किसी से छुपे हुए नहीं हैं।
अभी 25 जनवरी को आसियान प्रतिनिधियों का जमावड़ा भी हुआ। इस मौके पर राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ राजनीतिक, सुरक्षा, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों के जरिए दक्षिण पूर्व एशिया के साथ हमारे पुराने संबंधों को मजबूत बनाना है। इस संदर्भ में भारत इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समृद्धि के समर्थक के रूप में आसियान की भूमिका को अत्यंत महत्व देता है। हमारी भागीदारी हमारी साझा विरासत पर आधारित है और यह लोगों के बीच आपस में संपर्कों की नींव पर खड़ी है।
आसियान के जो शासनाध्यक्ष और राष्ट्राध्यक्ष राष्ट्रपति भवन गए, उनमें ब्रुनेई के सुल्तान हाजी-हसनल-बोल्किया मुइज्जाद्दीन वदाउल्लाह, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विदोदो, फिलीपीन के राष्ट्रपति रोड्रिगो रोआ दूतरते, कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुनसेन, सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली सिएन लूंग, मलेशिया के प्रधानमंत्री दातो स्री मोहम्मद नजीब बिन तुन अब्दुल रजाक, थाईलैंड के प्रधानमंत्री जनरल प्रयुत छान-ओ-चा, म्यांमार की स्टेट काउंसलर आंग सांग सू ची, वियतनाम के प्रधानमंत्री नग्युएन जुआन फूक और लाओ पीडीआर के प्रधानमंत्री थोंगलोंन सिसोलिथ शामिल हैं। जिन प्रमुख बिन्दुओं पर सहयोग की जरूरत पर जोर दिया गया उसमें मेरीटाइम ट्रांसपोर्ट एग्रीमेंट, समुद्र में सिक्योरिटी, समुद्र में व्यापार और सबसे अलग और नई बात यह रही कि आसियान वूमन नेवी दस्ते को बनाना है।
प्रिय पाठको, आप शायद देश और दुनिया में घटित अप्रिय घटनाओं को भूल गए होेंगे। क्या हमें यह जीवन इसी लिए मिला है कि हम अन्याय होते देखते रहें। क्या आपको रोहिंग्या में कत्लेआम, वियतनाम युद्ध, कश्मीर, लिबिया, ईराक, सीरिया, फिलिस्तीन और आऐ दिन हिन्दुस्तान में घटने वाली घटनाएं विचलित नहीं करतीं हैं। क्या ऐसा नहीं लगता कि यह सब अब कभी नहीं होना चाहिए, आज हमें कितने आधुनिक हुए हैं और नैतिकता के मामले में हम कितने नीचे चले गए हैं। युद्ध, अराजकता, प्राकृतिक आपदा इत्यादि इन्हीं सब अप्रिय घटनाओं से मानवता को बचाने के लिए शायद यूएनओज का जन्म हुआ होगा। आज दुनिया एक परिवार, एक करेंसी, एक नागरिकता की सोच चल रही है। जिस तरह देश के अन्दर अनेक राज्य हैं, मुख्यमंत्री हैं, राज्यपाल हैं सब राष्ट्रों का एक राष्ट्राध्यक्ष हो जिसको दुनिया के सभी देश माने, एक यूएन फोर्स हो। इस तरह सभी तरह के युद्ध, मानव संहार के लिए हथियारों की होड़ समाप्त हो जाऐगी। शायद यह सपना हो लेकिन यह एक दिन सच होकर रहेगा। यह किसी ने सोचा था, आज मैं सोच रहा हूं, हो सकता कल कोई और भी सोच रहा होगा, और इस तरह एक दिन सभी एक सोच वाले इस विषय पर जरूर सोचेंगे।
आज घृणित सोच, निचे लोग, निम्न सोच वाले लोग खाने पर इंसानियत का खून कर रहे हैं। क्या खाते हो, कुत्ता खाते हो, सांप खाते हो, चूहा खाते हो, मेंढ़क खाते हो, मछली खाते हो, अण्डा खाते हो, मांस खाते हो, किसका मांस खाते हो, क्यूं खाते हो कि राजनीति कर रहे हैं? यह विषय बनाया किसने हैं? कभी मंदिर कभी मस्जिद? अफसोस है कि कभी गरीबी को विषय नहीं बनाया गया। आज देश का 99 प्रतिशत धन एक प्रतिशत लोगों के पास है। 99 प्रतिशत के पास 01 प्रतिशत धन। क्या इसे विकास कहा जाऐगा। क्या आसियान या दावोस के प्रतिनिध अज्ञान और अंधे हैं? क्या हमने कभी दिल्ली को पूरा देखा है? दिल्ली में आज भी बहुत सारी काॅलोनियों, झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग दयनीय स्थिति में रह रहे हैं। रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, भूख, बिजली, पानी, मकान, शौचालय से आजादी के 70 सालों के बाद भी खुली हवा में सांस लेने वाले देश के नागरिकों को अनदेखा किया जा रहा है। विकास का झूठा प्रचार करने से देश विकसित नहीं बन जाऐगा। आज भी देश गरीब है और तब तक रहेगा जब तक आर्थिक समानता को नहीं अपनाया जाता।
प्रिय पाठको, यह हम सब जानते हैं कि हमने दुनिया में कुछ दिन रहना है। यहां कोई हमेशा नही रहा है। सबको एक दिन जाना है। दुनिया के हर कोने में रहने वाला एक इंसान है चाहे वह किसी भी धर्म से हो, कुछ भी खाता हो। सबसे पहले हमें उसकी आर्थिक सहायता करना चाहिए अगर वह जरूरतमंद है तो। ज़ुल्म कहीं भी हो रहा हो उसकी निन्दा करनी चाहिए उसके लिए ज़ालिम राष्ट्र या नेता पर सारे राष्ट्रों को दबाव बनाना चाहिए। अगर हम आज नाइंसाफी, ज़ालिम का साथ देंगे तो इंतिज़ार करें बड़े कहर का जो सबको निगल जाऐगा और डकार भी न लेगा। मेरा कहने का मतलब साफ है कि आज कुछ असामाजिक तत्वों को जो राजनीतिक प्रोत्साहन दिया जा रहा है, जिस अज्ञानता के कारण धर्म के ठेकेदार, अपने राजनीति लाभ के लिए पूरे देश में डर, दहशत, अशांती का वातावरण बना रहे हैं, ये लोग देश को हानि पहुंचा रहे हैं। अंग्रेजी सरकार की गुलामी से आजादी के लिए सभी धर्मों के लोगों ने इस देश के लिए कुर्बानी दी है। सभी धर्मों के लोगों को इन अधार्मिक, फिरकापरस्त लोगों का बिल्कुल साथ नहीं देना चाहिए। हम चारों भाईयों और हमारे ख़ानदान के बीच जो नफ़रत, घृणा, दरार डाल रहें हैं उनका और उनके ख़ानदान का नाश हो। ऐसे असामाजिक लोग दुनिया के किसी भी कोने में रहने के लायक नहीं है। मैं अपने प्रिय पाठकों से अपील करता हूं कि इंसानियत के दुश्मनों से कोई नाता न रखें चाहे वह किसी भी धर्म, पार्टी या जाति से हो। आओ हम सब मिलकर एक अतिसुन्दर दुनिया के सपने को साकार करें।
-मुख्य संपादक मोहम्मद इस्माईल