आध्यात्मिक जीवन और दीक्षा की मूल शर्त प्रतिबद्धता और संकल्प शक्ति है: परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजानंद सरस्वती

बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजानंद सरस्वती ने कहा है कि आध्यात्मिक जीवन और दीक्षा की मूल शर्त प्रतिबद्धता और संकल्प शक्ति है. इसके बिना इस मार्ग पर चलना मुमकिन नहीं है. वे बिहार योग विद्यालय के स्थापना दिवस पर आयोजित समारोह को संबोधित कर रहे थे. बिहार योग विद्यालय की स्थापना 1963 में वसंत पंचमी के दिन विश्व योग आंदोलन के प्रवर्तक पमरहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती द्वारा की गयी थी और 1964 से यहां स्वामी शिवानंद की अखंड ज्योति जलनी आरंभ हुई.
स्वामी निरंजानंद सरस्वती ने कहा कि संकल्प दीर्घकालीन और लघुकालीन दो प्रकार के होते हैं. लघुकालीन संकल्प कम समय के लिए होते हैं. लेकिन दीर्घकालीन संकल्प लंबे समय के लिए होते हैं. दीर्घकालीन संकल्प के माध्यम से बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है. अनेक लोग दीक्षित होते हैं. लेकिन, संकल्प के बिना उनका दीक्षित होना सिर्फ नामधारी ही हो जाता है. आध्यात्मिक जीवन में इसका कोई मायने नहीं है. उन्होंने योग के विभिन्न पहलुओं की व्याख्या करते हुए कहा कि योग एक विज्ञान है, जीवन जीने की पद्धति है. इसे सिर्फ एक शारीरिक व्यायाम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि आज दुनिया में योग की जो पद्धतियां हैं उसके सिर्फ कुछ एक पहलु को लेकर ही विभिन्न योग के संस्थान उसकी शिक्षा दे रहे हैं. बिहार स्कूल ऑफ योगा, योग के व्यावहारिक पहलू का प्रचार करता आया है और इसी की शिक्षा देता है. स्थापना दिवस समारोह के पांच दिवसीय अनुष्ठान के दौरान विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम हुए. पूजन, हवन, श्री यंत्र आराधना के साथ-साथ योगनियों द्वारा ललितासहस्त्रानाम पाठ, देवी के तीनों स्वरूपों का पाठ के साथ-साथ अन्य अनुष्ठान हुए.
स्थापना दिवस का कार्यक्रम अपने आप में यहां का अद्भुतत कार्यक्रम है. इस कार्यक्रम में पूरी दुनिया के लोगों का एक समागम होता है. इस समागम में दुनिया के विभिन्न देशों में स्थापित बिहार योग विद्यालय से संबद्ध संस्थानों के प्रतिनिधियों, आश्रम के संन्यासियों तथा दीक्षित लोगों ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया. इस मौके पर अनेक लोगों ने वसंत पंचमी के पावन दिन दीक्षा ग्रहण किया. इस समारोह में मत्था टेकने मुंगेर के जिला पदाधिकारी उदय कुमार सिंह के साथ-साथ अन्य प्रशासनिक पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया और आशीर्वाद ग्रहण किया. कार्यक्रम में बाल योग मित्र मंडल के बच्चों ने अपने सुंदर कीर्तन व भजन से वातावरण को आध्यात्मिकता से ओतप्रोत कर दिया. यह ऐसा अवसर है जिसमें हर तरह के लोगों ने भाग लिया. इस दिन आश्रम में आम लोगों के लिए आश्रम का दरवाजा खुला रहा.
योग किसी जाति के लिए नहीं यह मानव जाति के लिए है और योग का सबको लाभ लेना चाहिए। सब स्वस्थ रहें, दीर्घायु रहें, खुशहाल रहें यह हमारी कामना है।
-आनन्द् किशोर, योग प्रशिक्षक