भारतीय राजनीति में परिवारवाद की जड़ कहां तक

एल.एस. हरदेनिया

राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने पर प्रधानमंत्री मोदी ने टिप्पणी करते हुए कहा है कि यह परिवारवाद का जीता-जागता उदाहरण है। परंतु नरेन्द्र मोदी यह भूल जाते हैं कि वे एक ऐसे परिवार के सदस्य हैं जिसके मुखिया की मर्जी के बिना कोई पंचायत का सदस्य भी नहीं बन सकता। मेरा इशारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। इसके 25 वर्ष बाद संघ ने राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया था और अपने राजनीतिक संगठन का नाम जनसंघ दिया था। बाद में आपातकाल के दौरान जनसंघ भंग कर दिया गया और आपातकाल के बाद भारतीय जनता पार्टी का गठन किया गया। तब से लेकर आज तक न तो जनसंघ का और ना ही भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष औपचारिक चुनाव से निर्वाचित हुआ है। संघ के प्रमुख की मर्जी से ही पार्टी का अध्यक्ष चुना गया है। यद्यपि चुनाव की प्रक्रिया का ढोंग किया अवश्य जाता है परंतु अंततः सरसंघचालक की मर्जी से ही अध्यक्ष बनता है। यदि संघ का समर्थन नहीं होता तो नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन पाते। न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर वरन राज्य और नीचे के स्तर पर ऐसे ही व्यक्ति पद पर बैठाए जाते हैं जिन्हें सरसंघचालक का समर्थन हो, चाहे पद मुख्यमंत्री का हो या कोई अन्य।

जनसंघ और भाजपा की एक और मुश्किल है। आरएसएस की परंपरा के अनुसार उनके सभी प्रमुख नेताओं को अविवाहित रहना अनिवार्य हैं। लालकृष्ण आडवाणी जी ही अपवाद हैं जिन्हें विवाहित रहने के बावजूद कई बार जनसंघ और भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया। परंतु जब उन्होंने संघ की नीतियों से असहमति जताई तो उन्हें अध्यक्ष का पद छोड़ना पड़ा। जैसे जब उन्होंने जिन्ना को सेक्युलर कहा तो उन्हें तुरंत पद से हटना पड़ा।

परंतु परिवारवाद अकेले कांग्रेस में नहीं है। यदि कांग्रेस का इतिहास देखें तो अनेक अवसरों पर कांग्रेस के बड़े पदों पर चुनाव हुए हैं। यहां तक कि इंदिरा गांधी, मोरारजी भाई को हराकर प्रधानमंत्री बनी थीं। इस बात को भी स्मरण रखना चाहिए कि इंदिरा गांधी उनके पिता जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री बनी थीं। इसी तरह राजीव गांधी, इंदिरा जी की दुःखद हत्या के बाद प्रधानमंत्री बने थे। शायद यह पहली बार है जब जीवित रहते सोनिया गांधी, राहुल गांधी को पार्टी का अध्यक्ष पद सौंप रही हैं।

यहां यह भी स्मरणीय है कि सोनिया गांधी ने दो बड़े त्याग किए हैं। पहला, राजीव गांधी की दुःखद हत्या के बाद हज़ारों कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उनसे पार्टी का नेतृत्व संभालने का अनुरोध किया था परंतु उन्होंने इंकार कर दिया था। इसी तरह प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करने से भी उन्होंने इंकार कर दिया था।

वैसे यदि कम्युनिस्ट पार्टियों को छोड़ दें तो देश में कोई भी बड़ी राजनीतिक पार्टी नहीं है जिसमें परिवारवाद न हो। बिहार में लालू प्रसाद यादव ने अपनी पत्नी और अपने दो पुत्रों को शासकीय पद सौंपे हैं। पत्नी को तो उन्होंने मुख्यमंत्री भी बनाया था। उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह ने अपने पुत्र अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री का पद सौंपा। पंजाब में अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल ने अपने पुत्र को उपमुख्यमंत्री बनाया था। जम्मू-कश्मीर में फारूख अब्दुल्ला ने अपने पुत्र उमर अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया। तमिलनाडू में करूणानिधि ने अपने पुत्रों को ही अपना उत्तराधिकारी बनाया है। यही स्थिति शिवसेना एवं लोकदल (चैटाला परिवार) में है।

देश के प्रधानमंत्री की हैसियत से जनता के सामने गुमराह करने वाले तथ्यों की यह परोसगारी मोदी को पसंद करने वाले लोगों को चुभती है। प्रधानमंत्री गांधी-नेहरू परिवार की जिस राजनीतिक-डायनेस्टी को अभिशाप की तरह प्रस्तुत करते हैं, उसी डायनेस्टी के दो सितारे मेनका गांधी उनकी कैबिनेट में मंत्री हैं और उनके बेटे वरूण गांधी लोकसभा सांसद हैं। विरोधाभासों की इस कहानी के सिरे बहुआयामी हैं। केन्द्रीय विधिमंत्री रविशंकर प्रसाद के पिता ठाकुर प्रसाद बिहार में संयुक्त विधायक दल की सरकार में मंत्री थे। केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल के पिता वेद प्रकाश गोयल अटलजी की सरकार में मंत्री थे। राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के बेटे रणवीर सिंह सांसद हैं और नाती संदीप सिंह विधायक हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह भाजपा विधायक हैं तो राजमाता विजयाराजे सिंधिया की बेटियां वसुंधराराजे दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं और यशोधरा राजे मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री हैं। बिहार के रामविलास पासवान और उनके बेटे चिराग पासवान मोदी के साथ ही राजनीति में काम कर रहे हैं। भाजपा में परिवार वाद की यह श्रृंखला हर उस राज्य में फैली है, जहां भाजपा की सरकारें कार्यरत हैं।

इन सभी पार्टियों में नेतृत्व का मुकुट चुनाव से नहीं सौंपा गया। कम्युनिस्ट पार्टियों में अवश्य नेतृत्व का निर्णय चुनाव से होता है।

मध्यप्रदेश स्तर पर देखें तो हमारे मध्यप्रदेश में भाजपा के सर्वमान्य नेता कैलाश जोशी के पुत्र, शिवराज सिंह की मंत्री परिषद के सदस्य हैं। इसी तरह एक और दिग्गज नेता सुंदरलाल पटवा (जो अब नहीं रहे) के भतीजे सुरेन्द्र पटवा भी चैहान मंत्री परिषद के सदस्य हैं। शहडोल से चुने भाजपा सांसद ने तो यह शर्त ही रख दी थी कि यदि मेरे पुत्र को विधानसभा के लिए उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा तो वे लोकसभा के लिए नहीं लडे़ंगे। जब तक ऐसा नहीं हुआ वे लोकसभा और विधानसभा के सदस्य बने रहे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार व धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं)