मिट्टी चिकित्सा से असाध्‍य रोगों का उपचार

सर्वाधरे सर्व बीजे सवशक्ति समन्विते ।

सर्वकाम प्रदे देवि सर्वेष्टं देहि में धरे ।। ( ब्रह्मवैवर्त पुराण )

अर्थात: हे पृथ्वी देवी! आप सबको धारण करने वाली हो, सर्वबीजमयी हो, सर्वशक्ति सम्पन्न हो, सर्वकामप्रदायिनी हो, प्रकाशमयी हो, देवी! आप हमारे मनोरथों को सिद्ध करो।

इस ब्रह्माण्ड में पांच तत्व-पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश व्याप्त है। पृथ्वी पंचतत्वों में पांचवा और अन्तिम तत्व है| पृथ्वी तत्व अन्य चार तत्वों का रस है। हमारा शरीर भी इन्ही पंचतत्वों से बना है। अप्राकृतिक आहार विहार और विचार से शरीर में इन पंचतत्वों का असंतुलन हो जाता है जिसके फलस्वरूप हम रोगी हो जाते हैं। प्रकृतिक चिकित्सा में इन्ही पंचतत्वों के माध्यम से शरीर को रोगमुक्त किया जाता है। पंचतत्व निर्मित मानव देह में पृथ्वी तत्व के गुण, लाभ एवं रोगमुक्ति में प्रयोग के विषय में जानकारी दे रहे हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा में माटी का प्रयोग कई रोगों के निवारण में प्राचीन काल से ही होता आया है। नई वैज्ञानिक शोध में यह प्रमाणित हो चुका है कि माटी चिकित्सा की शरीर को तरो ताजा करने जीवंत और उर्जावान बनाने में महती उपयोगिता है। चर्म विकृति और घावों को ठीक करने में मिट्टी चिकित्सा अपना महत्व साबित कर चुकी है। माना जाता रहा है कि शरीर माटी का पुतला है और माटी के प्रयोग से ही शरीर की बीमारियां दूर की जा सकती हैं।

शरीर को शीतलता प्रदान करने के लिए मिट्टी-चिकित्सा का उपयोग किया जाता है। मिट्टी, शरीर के दूषित पदार्थों को घोलकर व अवशोषित कर अंततः शरीर के बाहर निकाल देती है। मिट्टी की पट्टी एवं मिट्टी-स्नान इसके मुख्य उपचार हैं। मृदास्नान  (मड बाथ) रोगों से मुक्ति का अच्छा उपाय है।

विभिन्न रोगों जैसे कब्ज, स्नायु-दुर्बलता, तनावजन्य सिरदर्द, उच्च रक्तचाप, मोटापा तथा विशेष रूप से सभी प्रकार के चर्म रोगों आदि में सफलतापूर्वक इसका उपयोग कर जीवन शक्ति का संचार एवं शरीर को कांतिमय बनाया जा सकता है। रोग चाहे शरीर के भीतर हो या बाहर, मिट्टी उसके विष और गर्मी को धीरे-धीरे चूसकर उस जड़-मूल से नष्ट करके ही दम लेगी। यह मिट्टी की खासियत है।

मिट्टी-स्नान के लिए जिस क्षेत्र में जैसी मिट्टी उपलब्ध हो, वही उपयुक्त है लेकिन प्रयोग में लाई जाने वाली मिट्टी साफ-सुथरी, कंकर-पत्थर व रासायनिक खादरहित तथा जमीन से 4-5 फुट नीचे की होना चाहिए। एक बार उपयोग में लाई गई मिट्टी को दुबारा उपयोग में न लें। अगर मिट्टी बहुत ज्यादा चिपकने वाली हो तो उसमें थोड़ी-सी बालू रेत मिला लें। संक्रमण से ग्रस्त तथा अत्यधिक कमजोर व्यक्ति मिट्टी-स्नान न करें। ठंडे पानी से स्नान करने के पश्चात शरीर पर हल्का तेल मल लें।

सूखी मिट्टी स्नान : शुद्ध-साफ मिट्टी को कपड़े से छान लीजिए और उससे अंग-प्रत्यंग को रगड़िए। जब पूरा शरीर मिट्टी से रगड़ा जा चुका हो, तब 15-20 मिनट तक धूप में बैठ जाएं, तत्पश्चात ठंडे पानी से, नेपकीन से घर्षण करते हुए स्नान कर लीजिए।

गीली मिट्टी स्नान : शुद्ध, साफ कपड़े से छनी हुई मिट्टी को रातभर पानी से गलाकर लेई (पेस्ट) जैसा बना लीजिए और पूरे शरीर पर लगाकर रगड़िए तथा धूप में 20-30 मिनट के लिए बैठ जाएं। जब मिट्टी पूरी तरह से सूख जाए तब ठंडे पानी से पूरे शरीर का नेपकीन से घर्षण करते हुए स्नान कर लें।

किसी भी तरह की दुर्गन्ध को मिटाने के लिये मिट्टी से बढ़कर संसार मे अन्य कोई दुर्गन्धनाशक वस्तु नही है । मिट्टी में सर्दी और गर्मी रोकने की क्षमता है इसीलिए सर्दी-गर्मी दोनो मौसम में मिट्टी से बने घर अरामदायक सिद्ध होते हैं । इसी गुण के कारण यह विभिन्न रोगों में अपना अच्छा प्रभाव छोडती है। मिट्टी में विद्रावक शक्ति अचूक होती है । बडे से बडे फोडे़ पर मिट्टी की पट्टी चढ़ाने से, विद्रावक शक्ति के कारण वह उसे पकाकर निचोड़ देती है एवं घाव भी बहुत जल्दी भर देती है ।

मिट्टी मे विष को शोषित करने की विलक्षण शक्ति होती है। सांप, बिच्छू, कैंसर तक के जहर को खींचकर (सोखकर) कुछ ही दिनों में ठीक कर देती है। मिट्टी में जल को शुद्ध करने की शक्ति निहित है। जल शोधक कारखानों में गन्दे दूषित जल को मिट्टी के संयोग से कई चरणों में छानकर निर्मल एवं पीने योग्य बनाया जाता है।

मिट्टी में रोग दूर करने अपूर्व शक्ति है क्योंकि मिट्टी में जगत की समस्त वस्तुओं का एक साथ रासायनिक सम्मिश्रण सर्वाधिक विद्यमान है जबकि किसी एक दवा या कई दवाओं के मिक्सचर में उतना रासायनिक सम्मिश्रण सम्भव नही हो सकता। अग्नि, वायु, जल के वेग को रोकने की क्षमता मिट्टी में निहित हैं। मिट्टी में चूसने की शक्ति निहित है अतः वह शरीर से विष को चूस लेती है। शरीर की बहुत सारी पीड़ाएं तो मिट्टी के प्रयोग के कुछ ही क्षणों बाद शांत हो जाती हैं। सब्र संयम एवं विश्वास के साथ मिट्टी चिकित्सा की जाए तो जटिल रोग भी निश्चित ही चले जाते हैं।

मिट्टी के प्रयोग से बड़े से बड़ा घाव भी ठीक हो जाता है। रोग चाहें शरीर के बाहर हो या भीतर मिट्टी उसके विष एवं गर्मी को चूसकर उसे जड़ से नष्ट कर देती है।  पृथ्वी पर नंगे पैर चलने के लाभ: नंगे पैर चलने से नेत्र ज्योति बढ़ती है। नंगे पैर पृथ्वी के सम्पर्क में रहने से पैर मजबूत, स्वस्थ,सुडौल एवं रक्त संचरण बराबर होने से उनमे से गन्दगी एवं दुर्गन्ध निकल जाती है एवं बिबाई भी नहीं पड़ती। पाचन संस्थान सबल होता है एवं उच्च रक्तचाप व शरीर के बहुत सारे रोग आश्चर्यजनक रूप से दूर हो जाते हैं। सिरदर्द, गले की सूजन, जुकाम, पैरों और सिर का ठण्डा रहना आदि रोग दूर हो जाते हैं।

 

 

 

मृदास्नान  (मड बाथ) रोगों से मुक्ति

अप्राकृतिक आहार, अनियमित दिनचर्या एवं दूषित विचारों से जब शरीर में विजातीय द्रव्यों (विष) की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाती है तब इस विष को निकालने के लिए हमारे शरीर के प्रमुख मल निष्कासक अंग (त्वचा, आंत, फेफडे एवं गुर्दे) भी अक्षम हो जाते हैं। इस स्थिति में उक्त विष शरीर के अन्दर एकत्र होकर रोग पैदा करता है। प्राकृतिक चिकित्सा में इस विष को मिट्टी,पानी,धूप,हवा और आकाश तत्वों की सहायता से विकसित उपचारों द्वारा शरीर का शोधन कर रोगमुक्त किया जाता है। मात्र पृथ्वी तत्व के कुछ प्रयोगों से भी शरीर का शोधन कर सकते हैं।

रज स्नान: विधिः- शुद्ध साफ मिट्टी को कपड़े से छानकर उसे सम्पूर्ण शरीर पर रगड़ने के पश्चात् 10- 20 मिनट धूप में बैठें, तत्पश्चात ताजे पानी से स्नान कर लें। त्वचा नरम, लचीली एवं कोमल हो जाती है। शरीर के रोमछिद्र खुल जाने से शरीर का विजातीय द्रव्य (विष) पसीने के माध्यम से बाहर निकल जाता है। त्वचा के समस्त रोग एवं बरसाती फोडे- फुंसियाँ इस स्नान से मंत्रवत दूर हो जाते हैं।

गीली मिट्टी स्नान: महीन पिसी हुई मिट्टी को पानी के साथ घोलकर लेई की तरह बना लें फिर उसका पूरे शरीर पर लेपन करें, तत्पश्चात धूप में बैठ जाएं। मिट्टी के सूख जाने के उपरान्त धीरे-धीरे रगड़कर उसे छुड़ाने के बाद ताजे पानी से स्नान करें। यह प्रयोग किसी तालाब के किनारे जाकर तालाब की साफ मिट्टी से भी किया जा सकता है। यह स्नान बहने वाले फोडे-फुंसियोँ वाले शरीर के लिए अत्यन्त उपयोगी है। त्वचा की गन्दगी को हटाकर त्वचा को उजला बनाने में यह स्नान लाभप्रद है। सम्पूर्ण शरीर से विष को खींचकर शरीर का आन्तरिक शोधन करने में विशेष उपयोगी है।

मिट्टी की गरम पट्टी:  पट्टी के लिए साफ बलुई मिट्टी (जिसमें आधी मिट्टी एवं आधा बालू हो ) यदि यह न उपलब्ध हो तो किसी साफ जगह पर जमीन से एक- डेढ फिट नीचे की मिट्टी लेकर साफ करने के बाद उसमें पानी मिलाकर किसी लकड़ी आदि से चलाकर लुगदी जैसी बना लें। अब इस मिट्टी को रोगग्रस्त स्थान के आकार से थोड़ा बड़ा महीन कपड़े पर फैलाकर लगभग आधा इंच मोटाई की पट्टी बना लें। इस पट्टी का मिट्टी की तरफ वाला भाग रोगग्रस्त अंग पर रखकर किसी ऊनी कपड़े से ढक दें।

मिट्टी की ठण्डी पट्टी: इस पट्टी को बनाने की विधि गरम पट्टी की तरह ही है।अन्तर सिर्फ इतना है कि इस पट्टी को रोगग्रस्त अंग रखने के उपरान्त ऊनी कपड़े से नही ढकते बल्कि इसे खुला ही रहने देते हैं।

पेड़ू की मिट्टी पट्टी:  इस पट्टी का प्रयोग अन्य रोगों के अतिरिक्त मुख्य रूप से कब्ज दूर करने के लिए किया जाता है। इस पट्टी को बनाने हेतु  ‘मड ट्रे‘ के नाम से एक सांचा बाजार में मिल जाता है यदि वह न मिले तो उपर्युक्त विधि से लगभग 15 इंच लम्बी, 8 इंच चैड़ी तथा एक इंच मोटी पट्टी बना लें।

सावधानियाँ: यदि मिट्टी की शुद्धता पर संदेह हो तो उसे किसी बर्तन में गर्म करके ठण्डा कर लें। मलेरिया के ज्वर में,दमा के दौरे में एवं दिल का दौरा पड़ने पर पेड़ू पर मिट्टी-पट्टी का प्रयोग न करें। बालू मिश्रित मिट्टी न मिल पाने पर कच्ची ईंट को पानी में भिगोकर उपयोग में लाया जा सकता है।

मिट्टी-पट्टी बनाने के लिए मिट्टी को 10-12 घंटे पहले पानी में भिगोना सर्वोत्तम है। भिगोई गई मिट्टी का उपयोग चार-पाँच दिनों में कर लेना चाहिए। मिट्टी की लुगदी बनाते समय उसमें हाथ नहीं डालना चाहिए बल्कि किसी लकड़ी या चम्मच से चलाना चाहिए। एक बार उपयोग की गई मिट्टी का पुनः उपयोग नहीं करना चाहिए।

कब्ज: कब्ज को समस्त रोगों की जननी कहा जाता है अतः कब्ज होते ही इसकी चिकित्सा तुरन्त करनी चाहिए। कब्ज की चिकित्सा निम्न विधि से करें– प्रातः शौच आदि से निवृत्त होकर खाली पेट पेड़ू पर गर्म पानी की थैली से 10 मिनट गर्म सेंक करने के बाद पेड़ू पर 45 मिनट के लिए गर्म मिट्टी की पट्टी लगाएं (गर्म पट्टी से आशय है, जैसा कि पीछे पट्टी बनाने की विधि में बताया जा चुका है कि मिट्टी की पट्टी लगाकर ऊपर से ऊनी कपड़े से ढक दें।) जीर्ण कब्ज में इसे सुबह- शाम दोनों समय किया जा सकता है। शाम को भोजन से पहले ही यह प्रयोग करें।

बवासीर:  बवासीर कब्ज का ही परिणाम होती है इस रोग में मलद्वार के बाहर व अन्दर की नाड़ियां सूजन की वजह से फूल जाती हैं। इस रोग की चिकित्सा कब्ज की चिकित्सा विधि के अनुसार करें। इसके अतिरिक्त गूदा (मलद्वार) के मस्सों पर भी गीली मिट्टी की पुल्टिस (गेंद जैसी) रखें एवं उसे किसी गर्म ऊनी कपड़े से बाँध दें।

दाद: दाद एक ऐसा चर्म रोग है जो जल्दी ठीक नहीं होता परन्तु प्राकृतिक चिकित्सा से इससे मुक्ति पाई जा सकती है। इसके लिए दादग्रस्त स्थान पर 5 मिनट गर्म सेंक देने के बाद लगभग 30 मिनट के लिए गीली मिट्टी की ठण्डी पट्टी का प्रयोग करना चाहिए।

खुजली: इस रोग में छोटी-छोटी फुंसियाँ निकलती हैं जिनमें खुजली एवं जलन होती है। इस रोग की चिकित्सा निम्न विधि से करें-प्रातः खाली पेट- पेड़ू पर गर्म सेंक 10 मिनट + पेड़ू पर गर्म मिट्टी की पट्टी 45 मिनट + नीम की पत्तियों को डालकर उबाले गए पानी का एनिमा।( एनिमा की विधि अंत में दी गई है)

खुजली किसी अंग विशेष में हो तो वहाँ पर 5 मिनट गर्म सेंक देकर दिन में दो बार 30 मिनट के लिए गीली मिट्टी की ठण्डी पट्टी लगाएं और यदि पूरे शरीर में हो तो पूरे शरीर का गीली मिट्टी स्नान लें।

हिचकी:- हिचकी एक ऐसी क्रिया है जो कभी न कभी प्रत्येक व्यक्ति को आती है, परन्तु सामान्य स्थिति में यह 1-2 मिनट में स्वतः बन्द भी हो जाती है पर यदि यह घंटों या कई दिनों तक बन्द न हो तो कष्टकारी हो जाती है तब इसे रोग की संज्ञा दी जाती है। यह स्थिति किसी गंभीर रोग की चेतावनी भी हो सकती है। इस अवस्था में निम्न उपचार लें: प्रातः खाली पेट- पेड़ू पर गर्म सेंक 10 मिनट + पेड़ू पर गर्म मिट्टी की पट्टी 45 मिनट लें। सांयकाल में पुनः उपरोक्त उपचार करें।

ततैया, मधुमक्खी, बिच्छू आदि का विष उतारने के लिए: जहाँ पर विषैला काटे या डंक मारे, सर्वप्रथम उस स्थान को खूब ठण्डे पानी में भिगोएं या कपड़े की पट्टी को बार- बार ठण्डे पानी में भिगोकर रखें। 5 मिनट ठण्डा करने के बाद उस स्थान को हथेली से रगड़ें, तत्पश्चात गीली मिट्टी की ठण्डी पट्टी दिन में कई बार 30-30 मिनट के लिए लगाएं। जहर उतर जाएगा दर्द, सूजन समाप्त हो जाएगी।

एक्ज़िमा (उकवत):- उकवत एक ऐसा कष्टपूर्ण रोग है जो दवाओं से जड़ से ठीक नहीं होता परन्तु यदि सब्र एवं विश्वासपूर्वक इसकी प्राकृतिक चिकित्सा की जाए तो निश्चित रूप से इस रोग से मुक्ति मिल सकती है।

उपचार: प्रातः खाली पेट- पेड़ू पर गर्म सेंक- 10 मिनट। पेड़ू पर गर्म मिट्टी की पट्टी-45 मिनट + नीम की पत्तियों को डालकर उबाले गए पानी का एनिमा। एक्ज़िमाग्रस्त स्थान पर गर्म सेंक-5 मिनट,तत्पश्चात् गीली मिट्टी की लगभग एक इन्च मोटी गर्म पट्टी- 45 मिनट। दोपहर:- एक्ज़िमाग्रस्त स्थान पर गर्म सेंक- 5 मिनट,तत्पश्चात् गीली मिट्टी की लगभग एक इन्च मोटी गर्म पट्टी- 45 मिनट। सायंकाल:-एक्ज़िमाग्रस्त स्थान पर गर्म सेंक- 5 मिनट,तत्पश्चात् गीली मिट्टी की लगभग एक इन्च मोटी गर्म पट्टी- 45 मिनट।

आहार : एक्ज़िमा रोगी को चाहिए कि वह बिल्कुल सादा भोजन करे। नमक,मिर्च-मसाले,अचार, मुरब्बा एवं चीनी का पूर्णत्या त्याग कर दे। भोजन में हरी सब्जियों को उबाल कर लें साथ ही चोकर समेत आंटे (बिना छना आंटा ) की रोटी, सलाद व फलों का प्रयोग करें। इस रोग को ठीक होने में रोग की अवस्था के अनुसार तीन माह तक का समय लग सकता है। कुछ समय बाद उपरोक्त उपचार में परिवर्तन किया जा सकता है।

बुखार: बुखार की अवस्था में पेड़ू पर गीली मिट्टी की ठण्डी पट्टी दिन में 3-4 बार 30-30 मिनट के लिए लगाना चाहिए। अधिकांशतः 3-4 पट्टियों ही बुखार चला जाता है।

विषेश: तेज बुखार में यदि घबराहट बहुत बढ़ जाए तो पेड़ू पर गीली मिट्टी की ठण्डी पट्टी के साथ-साथ माथे पर भी गीली मिट्टी की ठण्डी पट्टी लगाएं। कंपकंपी के साथ बुखार हो तो  मिट्टी पट्टी का प्रयोग न करें। बुखार की अवस्था में नींबू पानी, जूस या सूप के अतिरिक्त कोई ठोस आहार न लें।

संकलनकर्ता: आनंद किशोर, योग गुरू एवं प्रकृतिक चिकित्सक