महामारी बनते स्ट्रोक पर और अधिक जानकारी की जरूरत: विशेषज्ञ

नई दिल्ली: स्ट्रोक पर दो दिन के कान्फ्रेंस (एनुअल स्ट्रोक मास्टरक्लास 2017 ) के समापन पर अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञोंने कहा कि ग्रामीण भारत की बड़ी आबादी को स्ट्रोक और इसके सही उपचार के बारे में जागरूक करना जरूरी है। भारतीय परिस्थिति, स्ट्रोक के बढ़ते प्रकोप और इसके उपचार की तकनीकियों और रणनीतियों पर केंद्रित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन बहुत सफल रहा। यह जानकारी देते हुए आर्टेमिस अग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज गुरूग्राम में डायरेक्टर न्यूरोइंटरवेंशनल सर्जरी और स्ट्रोक यूनिट के डायरेक्टर डॉ.विपुल गुप्ता का कहना है कि ‘‘स्ट्रोक का इलाज है फिर भी पूरी दुनिया में 1.7 करोड़ लोग इसकी वजह से जान गवां चुके हैं और इनमें 60 लाख भारतीय हैं। यह मृत्यु और रोगग्रस्त होने का तीसरा सबसे बड़ा कारण है और इसकी वजह स्ट्रोक के बारे में जागरूकता की कमी है। इसके उपचार के नियोजित कार्यक्रम नहीं हैं और भारत की आम जनता में इसकी जागरूकता नहीं होने से 2020 तक स्ट्रोक महामारी का रूप ले लेगा। आम तौर पर स्ट्रोक का प्रकोप लगभग 55 वर्ष की उम्र या उसके बाद होता है पर अब दैनिक जीवन में काम-व्यायाम की कमी के परिणामस्वरूप युवा भी इसका शिकार हो रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली में लोगों को ब्लड प्रेसर, दिल-धमनी की बीमारियों और डायबीटीज़ का अधिक खतरा है और युवा भी आसानी से स्ट्रोक के शिकार हो जाते हैं,’’ दो दिन के पूरे आयोजन में ‘समस्या आधारित सीख’ देने के लिए परस्पर संवाद को बढ़ावा दिया गया। कान्फ्रेंस से पहले बुनियादी तथ्यों पर विमर्श किया गया और सभी डॉक्टरों ने स्ट्रोक के उपचार को अत्याधुनिक बनाने की दिशा में अपने कार्यों के संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किए। तीन सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियों की समीक्षा कर जल्द ही उन्हें ‘जर्नल ऑफ वास्कुलर एण्ड इंटरवेंशनल न्यूरोलॉज़ी’ में प्रकाशित किया जाएगा।
खान-पान की गलत आदत और दैनिक जीवन में शारीरिक काम-व्यायाम के अभाव के कई दुष्परिणाम हैं जैसे सीवीडी, डायबीटीज़ और कोलेस्ट्रॉल बढ़ना जिससे ख्ूान की नलियों में प्लाक जमा होता है और मस्तिष्क तक खून पहंुचना रुक सकता है।’’ कान्फ्रेंस में एकत्र पूरी दुनिया के दिग्गज डॉक्टरों ने स्ट्रोक के उपचार की अत्याधुनिक तकनीकियों को प्रदर्शित किया। दो दिन के आयोजन में कुल मिला कर 1000 से अधिक डॉक्टरों की भागीदारी देखी गई। वर्कशॉप के तहत आर्टेमिस अस्पताल से स्टेंट लगाने का लाइव प्रसारण देखने का अवसर भी मिला।
स्ट्रोक पर भारत का सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हो गया है और यह एक नया रिकॉर्ड है कि दो दिन के आयोजन में कुल मिला कर 1000 से अधिक डॉक्टरों की भागीदारी के साथ वेबिनार और वीडियो कान्फ्रेंस के माध्यम से लाखों लोगों की ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज की गई।
वेस्क्यूलर न्यूरोलॉजी और न्यूरोइंटरवेंशनल सर्जरी के कंसल्टेंट डॉ. राजश्रीनिवास पार्थसारथी के अनुसार ‘‘छह में एक इंसान जीवन काल में कभी न कभी स्ट्रोक की चपेट में आता है। शुरू के 6 घंटों के अंदर उपचार शुरू कर देना सबसे जरूरी होता है और यह अवधि बेहद महत्वपूर्ण होती है। हालांकि आधुनिक तकनीक आने से यह 24 घंटों की अवधि हो गई है। फिर भी भारत में स्ट्रोक यूनिट का जल्द से जल्द काम में लगना बड़ी चुनौती है। वर्तमान में देश में 35 स्ट्रोक यूनिट हैं और ये मूलतः बड़े शहरों के प्राइवेट अस्पतालों में हैं। कई प्राइवेट अस्पतालो में सीटी स्कैन की सुविधा नहीं है और वे कुछ आमदनी के नजरिये से ऐसे मामलों को अन्य अस्पतालों या स्वास्थ्य केंद्रों में रेफर कर देते हैं। इससे समय का नुकसान होता है जबकि इस दौरान एक-एक मिनट अनमोल है। जहां तक सरकारी अस्पतालों की बात है स्ट्रोक के मरीजों के इलाज के लिए उनकी अलग टीम नहीं होती है।