क्या कांग्रेस को यूपी में अकेले चुनाव लड़ना चाहिए?

यह सवाल आज हर कोई कर रहा है कि कांग्रेस किसी का सहारा ले या सहारा बने. आज कांग्रेस की यह दयनीय हालत देखकर बड़ा आश्चर्य हो रहा है. आखिर क्या हुआ जो अपने ऊपर भरोसा ना रहा? अगर पुराने दिग्गजों पर भरोसा नहीं तो नये चेहरों का लाते. जितने मुंह उतनी बातें, चर्चा तो होगी और नये सवाल भी उछलते रहेंगे।
sonia-rahul-congressकुछ महीने पहले सियासत में नौसिखिया समझे जा रहे यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पहले तो अपनी रणनीति के बल पर अपने पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल सिंह यादव जैसे सियासी धुरंधरों को पटखनी देते हुए पार्टी और उसके चुनाव चिन्ह पर कब्जा कर लिया.
पार्टी सूत्रों के मुताबिक जब तक सपा का नाम और साइकिल चुनाव चिन्ह नहीं मिला था, तब तक अखिलेश ने कांग्रेस को 142 सीटें दे रखी थीं. अखिलेश ने ये बात लिखकर कांग्रेस को दी थी लेकिन समाजवादी पार्टी और साइकिल मिलने के बाद अखिलेश ने मजबूरी बताते हुए 121 सीटें ऑफर कीं.
इसके बाद जब 121 पर कांग्रेस ने हां की, तो वो 100 पर अटक गए. उनका कहना है कि, नेताजी की 38 लोगों की सूची को एडजस्ट करना है. बताया जाता है कि कांग्रेस 110 सीटों पर भी मान गई थी, लेकिन तब अखिलेश ने कहा कि, कुछ पुराने और आजम खान सरीखे नेताओं की सीटों की मांग आ गई है, मेरी पार्टी के कई लोग पार्टी छोड़ रहे हैं. इसलिए मैं 100 से ज्यादा नहीं दे पा रहा.
कांग्रेस आलाकमान अखिलेश के इस बदलते रुख से नाराज और हैरान है. पार्टी का कहना है कि या तो सपा 110 सीटें देने पर राजी हो वर्ना गठबंधन नहीं होगा। सूत्रों के मुताबिक गठबंधन की संभावना अब खत्म हो गई है और कांग्रेस ने 140 सीटों अपने प्रत्याशी घोषित करने की तैयारी शुरू कर दी है. शाम को कांग्रेस आलाकमान के साथ बैठक के बाद बाहर निकले गुलाम नबी आजाद ने गठबंधन के बारे में तो कुछ नहीं कहा लेकिन ये जरूर बताया कि बैठक में पहले और दूसरे चरण के चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नामों पर विचार किया गया.
अखिलेश के बदलते रवैये से अब कांग्रेस अपनी साख को और गिराना नहीं चाहती है. लेकिन वह यह भी जानती है कि इस वक्त 403 सीटों पर लड़ना उसके लिए पहाड़ चढ़ने जैसा है. बहरहाल, अब प्लान बी के तहत कांग्रेस स्क्रीनिंग कमेटी 403 सीटों पर उम्मीदवार तय कर रही है. चर्चा यह भी है कि अखिलेश से बातचीत की कमान अब खुद प्रियंका संभाल रही हैं.
जहां तक राय लेने की बात है, इसमाटाईम्स यह समझता हैं कि कांग्रेस पुरानी पार्टी होने के नाते अपनी साख को बरकरार रखते हुए पूरे भारत में कहीं भी किसी और पार्टी के नीचे न आए जो आए कांग्रेस के नीचे आए. यह हम सब जानते हैं कि अभी भाजपा और सपा की जनता की नज़रों में क्या हालत है.
-इसमाटाईम्स न्यूज