भारत का ऐसा एकमात्र मुगलकालीन गांव, जहां का हर दूसरा बच्चा है आईआईटी में

patwatoli-villageबदलाव की कहानी करवट ले रही है हिन्दुस्तान के गांवों में. वो गांव जहां गरीब और मजदूरों से लेकर साधारण तबके के लोग रहते हैं, यहां ग़रीबी है और भुखमरी भी, लेकिन इन्हीं गांवों में ‘नए हिन्दुस्तान’ की रचना की जा रही है. गया से 15 किमी दूर पटवा टोली नाम का एक गांव है. इस गांव को बिहार का ‘मैनचेस्टर’ भी कहा जाता है. लेकिन अब इस गांव की पहचान IITians से है. इस गांव की आबादी करीब 10 हज़ार है, जो बुनकर, खेतिहर और मजदूर है. लेकिन नई पीढ़ी का जुनून ऐसा है कि पिछले 15 सालों में 350 छात्र इंजीनियर बन चुके हैं और 200 छात्र आईआईटी में दाखिला ले चुके हैं. ये आंकड़े ऐसे ही नहीं बने. इसके पीछे इनकी कड़ी मेहनत, सच्ची लगन और जज़्बा है. आइए आज जानते हैं भारत के इस गांव के बारे में, जहां के उजाले से पूरी दुनिया रौशन हो रही है.

मोहल्ले की तंग गलियों से गुजरने पर आपको पावरलूम के ठक-ठक का शोर कानों में हमेशा सुनाई देगा. एक ओर इन पावरलूम के सहारे धागों को आपस में पिरो कर कपड़े बुनने की कवायद चल रही है, वहीं दूसरी ओर यहां के बच्चों की किस्मत तराशी जा रही है. इस गांव में कोचिंग की कोई व्यवस्था नहीं है. फिर भी इस मोहल्ले का हर दूसरा बच्चा अपनी मेहनत से आईआईटी में है.

इस गांव के पुराने IITian जब भी छुट्टी में आते हैं, तो वे अपना अधिकतम वक्त यहां के छात्रों के साथ गुजारते हैं. उन्हें टिप्स देते हैं और ग्रुप डिस्कशन के लिए प्रेरित करते हैं.  यहां के गांव के बच्चों के लिए ट्यूशन की व्यवस्था की जाती है. आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों का ध्यान रखा जाता है. छात्रों के पढ़ने के लिए अलग से कमरे की व्यवस्था की गई है.

मानपुर पटवा टोली के इंजीनियर लगभग एक दर्जन देशों में कार्यरत हैं. जिनमें से सर्वाधिक 22 लोग अमेरिका में हैं. इनके अलावा सिंगापुर, कनाडा, स्विट्जरलैंड, जापान, दुबई आदि देशों की प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्यरत हैं. यहां के लोगों के मुताबिक मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में राजा मान सिंह ने यह मोहल्ला बसाया था. जब मान सिंह गया से जयपुर वापस जाने लगे, तो कुछ बुनकर यहीं रह गए.

पटवाटोली में बनने वाला गमछा बहुत फेमस है. इसे बिहार के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी ख़ूब पसंद किया जाता है. बिहार के इस गांव के ज़्यादातर बच्चों ने गरीबी और अभाव में रह कर ही पढ़ाई की है. अभावों से ग्रस्त होने के बावजूद भी इन्होंने अपने हौसले को कभी पस्त नहीं होने दिया. घर में बुढ़ी दादी, माता-पिता, बहन और भाई की इच्छा रहती है कि उसके लाल कमाल करे. वास्तविकता यह है कि आज इन्हीं घरों से निकल रहा है वर्तमान भारत. हमें गर्व है इस जगह और यहां के निवासियों पर.