पर्यावरण का चीरहरण रोकना होगा

पर्यावरण दो शब्दों परि+आवरण से मिलकर बना है. यानी, हमारे चहुंओर जो कुछ है, मसलन, धरती, हवा, पानी, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और अन्य जीव ये सभी मिलकर हमारे पर्यावरण का निर्माण करते हैं. प्रकृति प्रदत्त सारी चीजें पर्यावरण के हिस्से हैं लेकिन कहना नहीं होगा कि हमारे चारों ओर का वातावरण यानी पर्यावरण आज किस हद तक विकृत हो चुका है. ये अलग बात है कि हम मंगल अभियान की सफलता का दंभ भरते हैं. पर हकीकत यही है कि हम साफ हवा और शुद्ध पानी के लिए भी तरस रहे हैं. अगर ऐसा ही विनाश चलता रहा तो दमघोंटू शहरों में वो दिन दूर नहीं जब आपको सांस लेने के लिए पैकेट बंद ऑक्सीजन भी खरीदना पड़े और जेब ढीली करनी पड़े, जैसा कि आजकल शुद्ध पानी के लिए लोगों को 15 से 20 रुपये प्रति लीटर चुकाने पड़ रहे हैं.

आज जंगलों की अंधाधुंध कटाई हो रही है. धरती के गर्भ से कोयला, खनिज और बालू निकाले जा रहे हैं. जंगल खत्म होते जा रहे हैं. खेल-खलिहान सूखते जा रहे हैं. पानी के स्रोत सूख रहे हैं. जलस्तर गिरता जा रहा है. साफ हवा के लिए तरस रहे हैं. औद्योगिकीकरण की वजह से हवा में प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है. शहरों में कंक्रीट के जंगल तापमान में बढ़ोत्तरी कर रहे हैं. सेवा सेक्टर में लगी तमाम छोटी-बड़ी कंपनियां क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन गैसों का उत्सर्जन कर रही है. लोग अपनी सुख-सुविधाओं के लिए भविष्य की पीढ़ी को गर्त में डाल रहे हैं. हर एक शख्स प्रकृति को अपनी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी समझकर उसका सारा लाभांश अपनी झोली में डाल लेना चाहता है, बिना यह सोचे समझे कि जब उसकी पीढ़ी संकट में होगी तब उनके या लाभांश बी उनके काम नहीं आएगा.

ऐसे में वक्त का तकाजा यही कहता है कि पर्यावरण का संरक्षण करें जो भारतीय दर्शन की धूरी रही है. सदियों से हमने पीपल की पूजा की है, तुलसी को जल दिया है. नदियों को देवी मानकर उसकी पूजा की है और धरती को अन्नदाता मानकर उसकी पूजा की है. वक्त फिर से ऐसे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का है. दुनियाभर के लोगों को इस निमित्त जागरूक करने के लिए हर साल 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया जाता है लेकिन यह भी रस्म अदायगी भर रह गई है.

सन् 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टॉकहोम (स्वीडन) में विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया था. इसमें 119 देशों ने भाग लिया और पहली बार एक ही पृथ्वी का सिद्धांत मान्य किया. इसी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP)का जन्म हुआ और तब से प्रति वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस आयोजित करके नागरिकों को प्रदूषण की समस्या से अवगत कराने का निश्चय किया गया. भारत में भी 19 नवंबर1986 से पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू हुआ.

कैसे करें पर्यावरण संरक्षण ?

–    जब भी खुशी का मौका हो एक पौधा अवश्य लगाएं. मसलन- जन्मदिन, वर्षगांठ या अन्य अवसरों पर एक पेड़ लगाएं.

–    बच्चों को हर साल ऐसे मौकों पर पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करें और उन्हें इसके आर्थिक फायदे से भी अवगत कराएं. जैसे अगर 10 साल का कोई बच्चा पेड़ लगाता है तो उसके 30 साल होने पर उस पेड़ से बड़ी रकम मिल सकती है.

–    कम से कम पानी का खर्च करें. पेड़-पौधों में इस्तेमाल किया हुआ पानी डालें.

–    गाड़ी धोने में भी इस्तेमाल पानी को खर्च करें.

–    गाड़ी का कम से कम इस्तेमाल करें. इसकी जगह सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें. कार पुल करें.

–    बिजली के उपकरणों को जरूरत के बाद बंद कर दें. किसी भी उपकरण को स्टैंड बाय मोड में न रखें.

–    वातानुकूलन का कम से कम इस्तेमाल करें.

–    रेडियो, टीवी, म्यूजिक सिस्टम का वॉल्यूम कम रखें.

–    ई बिलिंग और ई पेमेंट का उपयोग करें.

–    वर्षा जल का संचयन करें.

–    पॉलीथिन का इस्तेमाल न करें.

–    गैर पारंपरिक ऊर्जा के स्रोतों का इस्तेमाल करें.

–    कूड़े-कचड़ों को कभी भी न जलाएं. उसे डिकम्पोज होने दें.

–    कचड़ा प्रबंधन की तकनीकि अपनाए.

–    बचे हुए खाने न फेकें. संभव हो तो उसे गरीबों को दें.

–    बच्चों के खिलौने न फेंके, न जलाएं. उसका पुनर्चक्रण करें. गरीब और बेसहारा बच्चों को देकर उनके चेहरे पर खुशियां लाएं.

डॉ. प्रमोद के. प्रवीण

(लेखक पर्यावरणविद् हैं)