इन्सानियत का शो

-सुभाष चंदर

सूत्रधार-आइये मेहरबान कदरदान, आज तक आपको बहुत से शो दिखाए। आज आपको टनाटन शो दिखाता हूं। बिल्कुल नया शो। आपका अपना शो। आपकी इन्सानियत का शो। उसी इन्सानियत का जिस पर आपको ठूं-ठां किस्म का घमण्ड (सॉरी गर्व) है यूं दृश्य बहुत हैं। पर फिलहाल सिर्फ़ तीन दृश्यों से गुज़ारा कीजिए। लीजिए शो-शुरू…

(दृश्य-एक)
बकरा भक्त नहीं है!

बकरे के सामने छुरी है। छुरी गर्दन से थोड़ा दूर है। सो बकरा चीख रहा है। बकरा मिमिया रहा है। अपनी फटी-फटी आंखों से जिन्दगी की भीख मांग रहा है। बकरा रो रहा है। बकरा रो सकता है। आदमी देख रहा है। आदमी मज़बूर है। बकरा भोजन है। आदमी भोजनप्रिय है।
बकरे को अंग्रेजी नहीं आती। बकरे को हिन्दी-उर्दू, बंगला-मराठी कुछ नहीं आती। बकरे को छुरी देखकर सिर्फ चीखने की भाषा आती है। सो वह चीखता है। पुजारी बकरे की चीखों का अनुवाद करता है। देवी मां और भक्तों को समझाता है। देवी मां बखूबी समझ जाती है। बकरा चीखता है। मंदिर का घण्टा जोरों से बजता है। श्लोको का स्वर तेज हो जाता है। देवी खुश हो जाती ह। छुरी बकरे की गर्दन पर पड़ती है। खच की आवाज़ होती है। बकरे का खून सीधा देवी मां के मुंह पर लगता है। फिर लगा ही रह जाता है।
बकरा भक्त नहीं है। बकरा आदमी भी नहीं है। वह नास्तिक है। वह अधर्मी है। वह सिर्फ़ प्रसाद बन सकता है। आदमी प्रसाद नहीं बन सकता।
बकरे को मां ने बनाया है। बकरे को मां ने मारा है। मां को अपने बच्चों को मारने का अधिकार है। मां बच्चे का प्रसाद खा सकती है। भोग के बाद भक्त प्रसाद खा सकते हैं।
यह सब देखकर मुझे कभी-कभी लगता है कि मां कहीं सिर्फ़ मूर्ति ही तो नहीं है।

(दृश्य दो)
गाय हमारी माता है

मास्टर जी रोज़ पूजा करते हैं। मास्टर जी बच्चों को जीवों पर दया का पाठ पढ़ाते हैं। मास्टर जी गाय भी पालते हैं। मास्टर जी गाय का माता मानते हैं। मास्टर जी गाय की पूजा करते हैं। मास्टर जी गाय का दूध भी निकालते हैं।
गौमाता आजकल बीमार है। आजकल वह अपने बच्चों को पूरा दूध नहीं दे पा रही। सो मास्टर जी उसे इन्जेक्शन लगवाते हैं। मास्टर जी की गाय मां तड़फती है। बिलबिलाती है।  बुरी तरह रंम्भाती है। मास्टर जी भी तड़प जाते हैं। डाॅक्टर बताता है कि एक इन्जेक्शन से गाय को प्रसव पीड़ा के बराबर पीड़ा होती है। मास्टर जी हाय राम कहकर कानों पर हाथ रख लेते हैं। मास्टर जी बहुत दयालु हैं।
शाम को मास्टर जी फिर दूध निकालने जाते हैं। अपनी गाय मां को इन्जेक्शन लगाते हैं। इन्जेक्शन देखते ही गाय मां तड़प उठती है। फड़फड़ाती है। बिलबिलाती है पर मास्टर जी इन्जेक्शन लगाते हैं। गाय के तड़पने पर ‘हाय राम’ का उवाच करते हैं। इन्जेक्शन से मास्टर जी को किलो भर दूध और मिल जाता है।
मास्टर जी के लिये फालतू दूध और ‘हाय राम’ दोनों जरूरी हैं।

(दृश्य तीन)
खरगोश रोता क्‍यों है ?

आपने खरगोश देखा है ना? खरगोश बड़ा प्यारा जानवर है। खरगोश किसी को काटता नहीं है। खरगोश का चलना-फिरना, उछलना-कूदना सब अच्छा लगता है। खरगोश का हर काम प्यारा होता है। लेकिन खरगोश का रोना सबसे ज्यादा प्यारा है। खरगोश की आंखों से आंसू की जगह मोती निकलते हैं। मोती बहुत कीमती होते हैं। आदमीक को कीमती चीज़े अच्छी लगती हैं।
आईये, आपको एक दृश्य दिखाता हूं। इस कारखाने में हैंगर से खरगोश उल्टा लटका है। आदमी खरगोश को पिन चुभोता है। खरगोश रोता है। खरगोश की नर्म खाल में गर्म सलाख लगाई जाती है। खरगोश फिर रोता हैं नीचे पड़ा बर्तन भरता है। आपकी जानकारी के लिये अर्ज कर दूं कि खरगोश के आंसू बहुत कीमती होते हैं। खरगोश के आंसुओं से लिपिस्टिक में चमक आती है। लिपिस्टिक की कीमत बढ़ जाती है। जानते हैं ना-कीमती चीजें आदमी को पसंद होती है। खरगोश को रोना ही चाहिए। खरगोश रोने के लिए ही बना है।
खरगोश रोयेगा नहीं तो लिपिस्टिक में बढ़िया चमक कैसे आयेगी? लिपिस्टिक में चमक नहीं हुई तो औरतें खूबसूरत कैसे दिखेंगी? औरतों की खूबसूरती के लिये खरगोश का रोना बहुत ज़रूरी है।
खरगोश मूर्ख है। खरगोश रोना नहीं चाहता। खरगोश औरतों को बदसूरत बनाना चाहता है। फैक्ट्री वाले को रुलाना चाहता है। फैक्ट्री वाला आदमी है। उसे रोना नहीं चाहिए। रोने के लिए खरगोश है तो।
सूत्रधार- ऐसे बहुत से बकरे, गाय-भैंसे, खरगोश हैं। आदमी भी हैं। आदमी के आदमी रहने के लिये इनका रोना बहुत जरूरी है।
आदमी के पास पेट है। पेट बोलता है। इन्सानियत चुप रहती है। इन्सानियत और पेट में छत्तीस का आंकड़ा है। मजबूत चीज़ बोलती है। सो पेट बोल रहा है। इन्सानियत चुप्पी का अभ्यास कर रही है। इन्सानियत को चुप ही रहना होगा। वरना पेट चुप हो जायेगा। कार, टी.वी., बंगला सब चुप हो जायेंगे। धर्म की ताकत चुप हो जायेगी। जुबान का स्वाद चुप हो जायेगा। औरतों की खूबसूरती चुप हो जायेगी। इतना बड़ा खतरा इन्सानियत कैसे उठायेगी? सो उसे चुप रहना होगा। बोलने के लिए पेट है तो।
पता नहीं मैं क्यों रोता हूं। शायद मैं आदमी नहीं हूं। आदमी कभी नहीं रोता। रोता तो खरगोश है, बकरा है, गाय है। मुझे आदमी बने रहने के लिये खरगोश होने से बचना है। वरना मैं भी किसी देवी मां के भक्तों का प्रसाद बन जाऊंगा। फालतू दूध देने के लिये इन्जेक्शन का दर्द झेलूंगा। बिलबिलाऊंगा। तड़फूंगा। खरगोश की तरह मेरे जिस्म में लोहे की गर्म सलाखें लगाकर कीमती आंसूओं का प्रोडक्शन किया जाएगा। नहीं मैं आदमी ही ठीक हूं। आदमी बनना बेहद जरूरी है। रोने के लिये खरगोश वगैरह हैं तो।