लोकतंत्र और अपराधी

भारत की शासन प्रणाली का संचालन करने के लिये लोकतंत्र की व्यवस्था आरम्भ हुई। जो विश्व में अपने तरीके की सुन्दर एवं सुदृढ़ व्यवस्था बन गई है। भारतवासियों को चाहे व अमीर है या गरीब, किसी धर्म से जुड़ा हुआ है या सम्प्रदाय से, चाहे किसान है या मजदूर, चाहे शिक्षित है या अशिक्षित, चाहे पुरूष है या स्त्री, चाहे श्रीमत् है या भिखारी, चाहे ऊँची जाति का है या नीची जाति का, चाहे ग्रामीण है या शहरी, चाहे व्यवसायी है या बेरोजगार, चाहे अटालिकाओं मंे रहने वाला है या फुटपाथ पर सोने वाला, चाहे न्यायाधीश हो या अपराधी, चाहे सैनिक है या साधारण नागरिक यदि वह भारत का व्यस्क नागरिक है तो उसे अपना शासक अर्थात् केन्द्रीय सरकार के लिए सांसद एवं राज्य सरकार के लिए विधायक चुनने एवं बनने का पूरा हक ही नहीं अधिकार है। इसके साथ ही अपनी पसन्द का सांसद व विधायक चुनने की पूरी स्वतंत्रता है। ऐसे चुने जाने वाले जन प्रतिनिधि चाहे सांसद हो या विधायक देश एवं देशवासियों की समृद्धि, खुशहाली एवं सुरक्षा के लिए कानून बनाकर सुशासन देने का प्रयास करते हंै। लेकिन आजादी के साढे छः दशक व्यतीत होने के बाद देश की बागडोर सम्भालने वाले नेक, ईमानदार, कत्र्तव्यनिष्ठ, सिद्धान्तवादी, निष्ठावान, राष्ट्रभक्त, जनसेवक आदि गुणों वाले सांसदों एवं विधायकों की कमी खलने लगी है। जिसके कारण देश की लोकतंत्रीय प्रणाली कमजोर होती जा रही है। अपमानित हो रही है। कलंकित हो रही है। राष्ट्र भक्ति से भटक रही है।

वर्तमान में यदि हमारे लोकतंत्र की शासन प्रणाली का आंकलन करें तो हमारे देश की सर्वोत्तम शासन सम्भालने वाली लोकसभा में करीबन 30 प्रतिशत, राज्य सभा में 17 प्रतिशत एवं विधानसभाओं में 31 प्रतिशत चुनकर आने वाले जन प्रतिनिधि किसी न किसी असामाजिक गतिविधियों, अत्याचारों, अनाचारों, दुराचारों, व्यभिचारों, भ्रष्टाचारों आदि में लिप्त होने के कारण दागी बने हुए है। जिन पर एक नहीं अनेक मुकदमें न्यायालय में चल रहे हैं। दोषी पाये जाने के बाद अदालतों में अपील कर अपने अपराधिक मुकदमों को लंबित कर रहे हंै। इन अपराधिक गतिविधियों में लिप्त हमारे लोकतंत्र के कर्णधारों से अच्छे, सुदृढ़, देश हित में, जनसाधारण की सुरक्षा आदि के लिए बनाये जाने वाले कानूनों मंे ऐसे दागी अपराधिक मामलों में लिप्त सांसद एवं विधायक रोड़ा डाल कर अपने अपराधों से मुक्त होने का मार्ग बना देते है। जिसके कारण देश की आंतरिक शांति व्यवस्था लड़खड़ाने लगी है। जनता की रक्षा करने वाली शक्तियों ऐसे दागी अपराधिक लोगों के आगे बोनी बन गई है। पंगु बन जाती है। गुलाम बन गई है। जिसके कारण लोकतंत्र के रखवाले सांसदों व विधायकों में दिनों दिन अपराधिक वृत्तियों बढ़ने लगी है। ऐसे दागी एवं अपराधी जन प्रतिनिधियों का न धर्म होता है न ईमान, न मजहब होता है न रिश्ता, न पार्टी होती है और न ही उनके असूल और सिद्धान्त इनका यदि कुछ है तो येनकेन प्रकार से सता पर काबिज होना।

सांसद एवं विधायक बनने वाले दागी एवं अपराधिक लोगों ने देश को हर तरह से लूटना शुरू कर दिया है। जिनके आतंक एवं अत्याचारों से सभी भयभीत है। जिनके भ्रष्टाचार ने देश को कलंकित ही नहीं किया है अपितु कंगाली के कगार पर खड़ा कर दिया है। ऐसे लेागों की दादागिरी से सभी भयभीत है। जिन्होंने देश की सुरक्षा को दाव पर लगा रखा है। मानवता इनके आगे गिड़गिड़ाती रहती है। दंबगाई से व्यभिचार को इन्होंने अपना अयासी का हथियार बना लिया है। मालामाल होने के लिए दूसरों की सम्पति को हड़पने में ऐसे लोगों को तनिक भी अफसोस नहीं होता। सरकारी तंत्र को गुलाम समझ कर उन्हें धिनौनी ताड़ना देने में नहीं चूकते है। अपने स्वार्थ के लिए – हित साधने के लिए हत्या करने जैसे हथकंडे अपनाने में इन लोगों को तनिक भी दया नहीं आती है। काला बाजारी, चोरबाजारी, तस्करी को प्रोत्साहित कर  धन बटोरने का धंधा बना लिया है। सरकारी खजाने को अंधाधुन लुटने का अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझ रखा है। ऐसे लोकतंत्र के प्रहरियों ने देश की कानून व्यवस्था को चैपट कर रखा है न्याय को पंगु बना दिया है। जिसके कारण लोकतंत्रीय व्यवस्था लड़खड़ाने लगी है। कमजोर एवं कलंकित होने लगी है।

दागी लोकसभा सांसदों एवं विधानसभाओं में विधायकों की अपराधिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए न्याय पालिका ने प्रयास भी किया लेकिन सत्ता के भूखे राजनैतिक दलों ने दागी और आपराधिक प्रवृत्तियों मंे लिप्त लोगों को बचाने के लिए न्यायपालिका के फरमानों को प्रभावशाली नहीं बनने दिया है। भला बताईये कि देश के लोकतंत्र के रखवाले कहलाने वाले दागी एवं विभिन्न अपराधों में लिप्त न्यायलयों से दंडित सांसदों व विधायकों से देश को सुशासन, रामराज्य कैसे मिले कि क्या कल्पना की जा सकती है। यदि देश में सुराज्य की स्थापना करनी है तो दागी – अपराधी जनप्रतिनिधियों पर अंकुश ही नहीं लगाना है अपितु इन्हें लोकतंत्र के मंदिरों-संसद एवं विधान सभा में पहुंचने से रोकना होगा। यदि ऐसा समय रहते नहीं किया गया तो देश तो खतरे में पड़ेगा सो पड़ेगा ही वहां संसद एवं विधानसभा में प्रतिनिधि के रूप में पहुंचने वाली महिलाओं को दागी एवं अपराधिक जन प्रतिनिधियों से अपनी इज्जत की भविष्य में रक्षा करनी भी एक गम्भीर समस्या बन सकती हैं।

– भूरचन्द जैन, स्वतंत्र पत्रकार, बाड़मेर