उत्तराखण्ड आपदा से सबक लेने की जरूरत

उत्तराखण्ड में आई तबाही के बाद लोगों को दुर्गम स्थानों से निकाला जा चुका है और अब बीमार, हताहतों को राहत पहुंचाई जा रही है। बरसात से पहले की इस बारिस में उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों में लगभग 700 गांवों में नुकसान हुआ हैं, तीर्थ यात्रियों से जुड़ा कारोबर खत्म हो गया और सड़कें व पुलों के टूटने से जीवन अस्त-व्यस्त हो गया हैं। अभी बरसात बाकी है और हर साल बरसात के दिनों में पहाड़ों का सफर खतरनाक हो जाता है लेकिन पहाड़ों में सभी चालक एक दूसरे से तालमेल बनाकर एक दूसरे को आगे पीछे सड़क की स्थिति बताते हुए चलते हैं जिससे यात्रिगण अपने घरों को सकुशल पहुंच जाते हैं।

16 जून को आई भयंकर तबाही में केदारनाथ शहर को सबसे ज्यादा जान व माल की क्षति हुई है। मातम की इस घड़ी में मौके का फायदा उठाकर कुछ मौका परस्त लोग जिनमें कुछ साधुओं ने इंसानियत को दरकिनार करके हैवान बनकर लाशों के साथ खिलवाड किया, क्या ये हमारे धर्मगुरू हो सकते हैं? पाखण्ड व पाखण्डियों का खात्मा होना जरूरी है, ऐसे दुराचारियों के लिए मृत्युदण्ड कमतर सज़ा है। रोंगने खड़ी कर देने वाली इस तबाही से देश की जनता ने कुछ नहीं सिखा और मूर्ख जनता फिर मस्त हो गई। मगर होना तो यह चाहिए था कि इससे हम कुछ इबरत (सीख) लेते, होना तो यह चाहिए था कि कम से कम एक हफ्ते का राष्ट्रीय शोक रखा जाता, पहाड़ों को खोखला करने की प्रक्रिया को बंद किया जाता, जगह-जगह प्रगति के नाम पर बैठे अनावश्यक खनन माफिया को भगाया जाता और तमाम मकानों का निरीक्षण होता तो आने वाले बरसात में और जानें बचाई जा सकती हैं। वरना अगर पहाड़ न रहे तो ये मैदानों में रहने वाले भी मौत के तांडव के लिए तैयार रहें क्यूंकि यह हम सभी जानते हैं कि सारा का सारा पानी बर्फ के रूप में पहाड़ों पर जमा हो रखा है।

यह भी सच है कि उत्तराखण्ड में आपदा के लिए उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहगुणा जिम्मेदार नहीं हैं क्योंकि आपदा किसी के बुलाने से नहीं आई, यह प्रकोप है, गुस्सा है उस पालनहार का जिसके हुक्मों को हमने नकारा हुआ है। मुख्यमंत्री विजय बहगुणा ने तुरन्त कार्यवाही करके लाखों जानों को पहाड़ों से निकलने में सेना की मदद ली बस वे इतना ही कर सकते थे हां अगर किसी डूबते का हाथ पकड़ लेते तो उनका कद बहुत ऊँचा हो जाता मगर ऐसा हमारे देश के किसी नेता में जज़्बा नहीं है।

शहरों की आपा-धापी, मारा-मारी और बैचेनी से दूर लोगों को पहाड़ों में कुछ दिन बिताना अच्छा लगता है मगर हमारी नाकाम सरकारों ने कोई प्लानिंग नहीं की। जिसकी जैसी मर्जी आई अपने धन के बल पर यहां वहां नदी नालों के तटों पर बैतुके मकान बना डाले। क्या हम लोगों को यह समझना जरूरी नहीं कि हम 60 या 70 सालों के लिए किराएदार बनकर आएं हैं फिर क्यूं मालिक बनने की कोशिश करते हैं। मेरा तो यह मानना है कि अगर हम एक दूसरे के खासकर जरूरतमंदों को दान दें तो तमाम आफतों, हादसों, गमों, मुसीबतों से बचे रह सकते हैं, यह एक अलग विषय है। अपने पड़ोस, रिश्तेदारों के ख्याल किए बगैर अगर हम तीर्थ यात्रा, चारधाम यात्रा, या हज के लिए जाए तो यह सब कबूल नहीं होगा, सिर्फ दिखावा है और इससे कोई फायदा नहीं, बस अपने आप को तसल्ली देना भर है।

बात हो रही थी पहाड़ों की मधुर यात्रा की जिसके लिए सड़कों की सुरक्षा, नदी नालों व सड़क से हटके सुरक्षित विश्रामग्रह, होटल इत्यादि का नए ढंग से बनाने की जरूरत है।  जिससे पर्यटक आने से कतराए नहीं, वैसे इस आपदा से सभी के दिल दहले हुए हैं, कई लोग जिन्होंने इस तबाही को अपने आंखों से देखा है उनके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। हमारा तो घर है हम हजार बार आऐंगे, जाऐंगे और उत्तराखण्ड को खुशहाल बनाने की तमन्ना करेंगे। बस अन्त में यह कहूंगा कि इंसान को इंसान से मुहब्बत होनी चाहिए, मेरी रोटी में सबके दांत वाली प्रथा होनी चाहिए। सर्वे भवन्तु सुखिना व सर्वे भवन्तु निरामया की भावना दिल में होनी चाहिए तभी हमारा पालनहार हमसे खुश रहेगा वरना अभी तो उनके जलाल से डर लगता है। हम सब की हमारा पालनहार अपने जलाल व गुस्से से हिफाजत फरमाए, आमीन।

सम्पादक-मोहम्म्द इस्माईल