गांधी की अहिंसा है मानवता का महागीत

लेखक: गणि राजेन्द्र विजय

गांधी जयन्ती को अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाते हुए मुझे एक संस्मरण याद आ रहा है-एक बार राजेन्द्र बाबू चरखा काटते समय सामने प्लेट में रखी किशमिश के दाने खा रहे थे। तभी कहीं से कोई चींटा आकर उस प्लेट पर चढ़ गया। राजेन्द्र बाबू ने उसे हटाने के लिए अपनी अंगुली से छिटक दिया। चींटा थोड़ी दूर जाकर गिरा और थोड़ा छटपटा कर मर गया। राजेन्द्र बाबू बहुत दुःखी हुए। उन्होंने किशमिश खानी छोड़ दी और चरखा भी बंद कर दिया।

राजेन्द्र बाबू ने महात्मा गांधीजी से इस घटना का उल्लेख किया और पूछा कि क्या मेरे से यह हिंसा हो गई है।

बापू ने कुछ देर सोचकर कहा-तुमने शुद्ध मन से, मात्र चींटा को हटाने के लिए ही अंगुली से छिटका था। तुम्हारा उसे मारने का कोई इरादा नहीं था। इसलिए तुमने कोई हिंसा नहीं की। तुमको उसकी मृत्यु का दुःख है, यही इसका प्रमाण है।

गांधीजी अहिंसा के सूक्ष्म व्याख्याता ही नहीं, बल्कि प्रयोक्ता भी थे। उनका उपरोक्त घटना के सन्दर्भ में मत था कि हिंसा मन से शुरू होती है, वाणी उसे प्रकट करती है और शरीर उसे कार्य रूप देता है। इस चींटा की मृत्यु में न मन साथ था, न वाणी और कर्म भी हिंसा के उद्देश्य से नहीं था। शारीरिक शक्ति ही नहीं, मन और वचन भी हिंसा के साधन है। ठीक इसके विपरीत अहिंसा भी मन, वचन और कर्म से अपना प्रभाव डालती है। मन, वचन, कर्म तीनों शुद्ध पवित्र हों, हिंसा शून्य हों, तभी वह पूर्ण अहिंसा है। जैसे हिंसा का मूल मन है, उसी प्रकार अहिंसा का मूल भी मन है। मन ही आत्मा है। मानसिक बल ही आत्मिक बल है।

अहिंसा का अर्थ केवल मानव के प्रति ही अहिंसा का भाव नहीं अपितु संपूर्ण प्राणीजगत के प्रति मैत्री, करुणा, दया, क्षमा और अहिंसा का भाव रखना है। छोटे से छोटे जीवाणु को भी कष्ट न हो, उसके प्रति भी आत्मीय भाव रखना ही अहिंसा का दिव्य, लोकोत्तर रूप है। इसी को महर्षि व्यास ने ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ कहा है।

मनुष्य प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है परन्तु उसे एक खतरा भी है। नारी कोख से जन्म लेकर भी उसका जीवनभर मनुष्य बने रहना निश्चित नहीं है। पशु-पक्षियों को ऐसा कोई भय नहीं है। वे जिस रूप में जन्मते हैं, मरने तक उसी रूप में बने रहते हैं। पर मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है। एक ओर यदि वह पुरुषार्थ कर ले तो नर से नारायण बनने की राह पर चल सकता है, पर दूसरी ओर, यदि वह अधर्म और पाप के मार्ग पर कदम बढ़ा ले तो इसी चोले में रहते हुए उसे दानव या पशु बनते भी देर नहीं लगती। यदि मनुष्य को मनुष्यता के साथ गर्व से जीना है तो उसे जीवनभर एक साधना करनी पड़ेगी। उस साधना का नाम है- ‘अहिंसा’। अहिंसा का दामन छोड़कर इंसान का ज्यादा देर तक इंसान बने रहना मुमकिन नहीं होता।

अहिंसा मानसिक पवित्रता का नाम है। उसके व्यापक क्षेत्र में सत्य, अचैर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह आदि सभी सद्गुण समा जाते हैं, इसलिए अहिंसा को परम धर्म कहा गया है। संसार में जल, थल और आकाश में सर्वत्र सूक्ष्म-जीव भरे हुए हैं, इसलिए बाह्य आचरण में पूर्ण अहिंसक होना संभव नहीं है, परन्तु यदि अंतरंग में समता हो और बाहर की प्रवृत्तियां यत्नाचारपूर्वक नियंत्रित कर ली जाएं, तो बाह्य में सूक्ष्म जीवों का घात होते हुए भी साधक अपनी आंतरिक पवित्रता के बल पर अहिंसक बना रह सकता है।

अहिंसा का क्षेत्र संकुचित नहीं है। दार्शनिक परिभाषा में चित्त का स्थिर बने रहना अहिंसा है। जीव का अपने साम्यभाव में संलग्न रहना अहिंसा है। क्रोध, मान, माया, लोभ से रहित पवित्र विचार और सद्-संकल्प ही अहिंसा है। अंतरंग में ऐसी आंशिक समता लाये बिना अहिंसा की कल्पना नहीं की जा सकती।

अहिंसा पर प्रायः यह आरोप लगाया जाता है कि वह एक नकारात्मक विचार है और सांसारिक जीवन में व्यवहार्य नहीं है, परन्तु अहिंसा पर जो अध्ययन हुआ है और समाज में अहिंसक जीवन के जो उदाहरण सामने आये हैं उनके समाधान पर ये दोनों आरोप निराधार सिद्ध होते हैं। अहिंसा अव्यावहारिक नहीं है। वह पूर्णतः व्यावहारिक है और जीकर दिखाने की कला है।

कुछ लोग हिंसा के जवाब में हिंसा के द्वारा ही उसका उत्तर दे देना आवश्यक और उचित मानते हैं। उनका यह भी विश्वास है कि इस प्रकार प्रतिहिंसा के प्रयोग से हिंसा को समाप्त किया जा सकता है। किन्तु यह बात अच्छी तरह समझी जा सकती है कि प्रतिहिंसा किसी हिंसा को रोकने या समाप्त करने का उपाय नहीं है। उससे तो हिंसा और पनपती है। वैर-विरोधी को और प्रोत्साहन मिलता है। वैर की यह वासना जन्म-जन्मान्तर तक जीव के साथ चलती है। अवसर पाते ही वह अपना बदला लेता है।

हमारे पास मन, वाणी और शरीर- ये तीन ही साधन हैं, धर्म तो वही हो सकता है जो इन तीनों में बस जाए, इन तीनों को पवित्र करे। वास्तव में परम धर्म तो एक ही है और वह है ‘अहिंसा’।

भारतीय चिंतकों ने कहा-‘अहिंसा परमो धर्मः यतो धर्मस्ततो जयः’

संसार के अन्य किसी भी देश में अहिंसा की परम्परा इतनी व्यापक इतनी समृद्ध, और गहरी नहीं है जितनी कि भारत में है। यहां मानव जीवन को समग्रता की दृष्टि से देखा गया तथा अहिंसा को परम कर्तव्य माना गया। भारत की पुण्यधरा से ‘एकात्म मानव दर्शन’ प्रसारित हुआ।

भगवान महावीर ने अहिंसा को अनेक पहलुओं से देखा है। भगवान महावीर के शब्दों में हिंसा एक ग्रंथि है, मोह है, मृत्यु है, नरक है, बुद्धि का नाश करने वाली है, और मनुष्य के लिए अहितकर है। इच्छा, सत्ता और अपरिग्रह से हिंसा सींची जाती है। इसलिए इन तीनों को संयमित करना अत्यंत आवश्यक है। इन्द्रियों का सुख-सुविधाओं के प्रति आकर्षण, अहंकार और ममकार का दवाब व्यक्ति को हिंसा के विनाशकारी रूप की सच्चाई समझने नहीं देता।

ब्रिटिश शासनकाल में अहिंसा का व्यापक प्रयोग राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने किया और लोगों को उससे जोड़ा। गांधीजी के चिंतन के बुनियादी तत्त्व थे ‘सत्य और अहिंसा’। उन्होंने अहिंसात्मक सामाजिक संरचना के मामले को सत्ता के विकेन्द्रीकरण, अपरिग्रह और स्वदेशी के साथ जोड़ा। व्यक्ति के जीवन में मूल्यों को ढ़ालने पर बल दिया, स्वयं भी उस पर दृढ़ता से जमे रहे। गांधीजी ने मानव जीवन को समग्रता की दृष्टि से देखा।

गांधीजी ने अहिंसा को एक आंदोलनात्मक शस्त्र के रूप में उसकी उपयोगिता को समझा और इसका स्वतंत्रता-संघर्ष में प्रयोग किया। संसार चकित था कि एक निर्धन देश जिसमें साक्षरता बहुत कम थी, इस अमोघ शस्त्र का सपफलतापूर्वक उपयोग कर सका। गांधीजी ने अपना पूरा जीवन सत्य की खोज और सत्य के प्रयोगोें के लिए समर्पित कर दिया था। उनके अनुसार सत्य साध्य है और अहिंसा साधन तथा अहिंसा तमाम धर्मों का हृदय है। गांधीजी सत्य को सबसे बड़ा कानून और अहिंसा को सबसे बड़ा कत्र्तव्य मानते थे। अहिंसा आत्मा का गुण है जो कि आस्था, अनुभूति से संबंधित है। जिस पर एक सीमा के बाद तर्क नहीं किया जा सकता।

गांधीजी कायरता को अहिंसा नहीं मानते थे। अहिंसा तो वीरों का शस्त्र है। सत्याग्रह में हृदय और मस्तिष्क की पवित्रता को सदैव अपनाया गया। किसी के प्रति बुरी भावना न हो तथा उद्देश्य नैतिक और उचित हो। जैन और वैष्णव परम्पराओं में पोषित अहिंसा में गांधीजी का दृढ़ विश्वास था। अहिंसा के प्रति गांधीजी का रवैया व्यावहारिक था।

प्रस्तुति-ललित गर्ग