अवसरवादी सरकारों से देश कलंकित त‍था भविष्‍य खतरे में

देश एक अनिश्चितता की स्थिति में है। लगातार महंगाई बढ़ रही है, सरकार कभी कोयले की कालिमा से कलंकित होती है तो कभी बार-बार की डीजल-पेट्रोल-रसोई गैस के अनुचित दाम बढ़ाने के सवालों से घिरती है। कभी एफडीआई के नाम पर अल्पमत में आती है तो कभी लोकपाल विधेयक, भ्रष्टाचार और कालेधन की वापसी एवं जन-विरोधी मुद्दे पर। अनिश्चितता एवं अस्थिरता किसी भी लोकतंत्र की स्वस्थता का लक्षण नहीं है और यह किसी भी सत्ताधारी पार्टी के लिये भी शुभ भविष्य का सूचक नहीं है।  बार-बार बन्द का आव्हान, सरकार विरोधी जन-आन्दोलनों का खड़ा होना या जन-आवाज को कुचलने के सफल प्रयास-ऐसी घटनाएं हैं जो न केवल सरकार बल्कि आम-जनजीवन के जीवन की डगर भी मुश्किल बनाती है। कॉरपोरेट लूट और भ्रष्टाचार में गले तक डूबी सरकार और सत्ताधारी हर विरोध के स्वर का गला घोंटने पर आमादा हैं। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को देशद्रोह के जुर्म में गिरफ्तार करवाना इसका साक्ष्य है। इन घटनाओं ने सरकार को अनेक बार अस्थिरत किया है, एफडीआइ एवं डीजल के बढे़ दामों में डूबती सरकार की नैया को भले ही मुलायम ने बचा लिया हो, पर बढ़ती महंगाई के दंश और करोड़ो फूटकर व्यापारियों की नाराजगी का असर आने वाले चुनावों पर पड़ने की संभावना से कैसे इन्कार किया जा सकता है? छठे वेतन आयोग को लागू करके सरकार वाह-वाही भले ही लूट रही है, लेकिन देश में आर्थिक अस्थिरता का एक बड़ा कारण यह भी है, एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के शासनकाल में यह और ऐसे ही अनेक फैसलों से देश आर्थिक असंतुलन के रसातल में धंस रहा है। समस्याएं तो अनेक हैं, समाधान की रोशनी कहीं नजर नहीं आती। बात कहां से शुरू की जाए। हम खो भी बहुत चुके हैं, जिनकी भरपाई मुश्किल है। गांधी जयन्ती के परिप्रेक्ष्य में एक प्रश्न बार-बार कौंधता है कि घोटालों, नाकामी एवं स्वार्थों से घिरी यूपीए सरकार आखिर कब तक आम भारतीय की असीम सहनशीलता एवं धैर्य की परीक्षा लेती रहेगी? हॉब्स कहते हैं कि राज्य और समाज एक-दूसरे के पूरक हैं और एक-दूसरे के साथ मिलकर रहते हैं, लेकिन हमारे देश की वर्तमान राजनीति व्यवस्था ऐसी बन गयी है जिसमें जनता और राजनीति (सरकार) की एकता केवल चुनाव के समय देखने को मिलती है। जनता और सरकार के बीच बढ़ती दूरियां अनेक समस्याओं का कारण बनती है, दोनों के बीच आंख मिचैनी का खेल आखिर देश को ही कमजोर करता है।

आज सारा माहौल राजनीति अपराध, अवसरवादिता और आर्थिक भ्रष्टाचार में रंग गया है। कल का छुटभैया और अपराधी आज नेता बन गया, सांसद और मंत्री बन गया। वह पूजा जाता है आज गांधी और महावीर से भी बढ़कर। वर्तमान राजनीति एवं राजनेताओं ने स्वयं को इतना महिमामंडित कर लिया है कि महापुरुषों की स्मृति सभाएं सूनी रहती हैं पर नेता को सुनने हजारों-लाखों की भीड़ तैयार। ये जेल की सलाखों के पीछे पहुंचकर भी अपने को आदर्शवाद का शीर्ष जताना चाहते हैं। कैसी विडम्बनापूर्ण स्थितियों एवं विवशताओं से रू-ब-रू है वर्तमान दौर। जहां न कोई आदर्श है, न कोई उद्देश्य। न सच्चाई है, न प्रामाणिकता। सिर्फ अवसरवादिता का लाभ उठाया जाता है। जबकि कैरिलल के अनुसार, एक अच्छा नायक हमेशा अपने से ज्यादा दूसरों की फिक्र करता है।

रावण का बुत हर साल जलता है मगर बुराइयां जीने के लिए फिर नये बहाने ढूंढ लेती हैं। श्रीकृष्ण की गीता जीवन के हर मोड़ पर निष्काम कर्म का संदेश देती है मगर संग्रह और भोग का अनियंत्रण मन को अपाहिज बना देता है। महावीर के जीए गए सत्यों की हर बार समीक्षा होती है मगर सिद्धांतों की बात शास्त्रों, संवादों और संभाषणों तक सिमट कर रह जाती है। गांधी का जीवन-दर्शन सिर्फ अतीत की याद बनकर रह गया है। गांधी को तो बस तस्वीर में मढ दिया गया है, उसके नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने का कुचक्र लगातार जारी है।

आज कहां है राम का वह संकल्प जो बुराइयों के विरुद्ध लड़ने का साहस करे? कहां है महावीर की अनासक्ति जो अनावश्यक आकांक्षाओं को सीमा दे सके? कहां है गांधी की वह सोच कि देश का बदन नंगा है तब मैं कपड़े कैसे पहनूं?

राज्य मनुष्य के हित में एक जरूरी और स्वाभाविक प्रक्रिया है। मनुष्य के लिए राज्य या सत्ता का होना बहुत जरूरी है। अरस्तू कहते हैं कि राज्य आदमी की स्वाभाविक जरूरत है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जब तक आदमी राज्य में नहीं रहता, वह जंगल में विचरता पशु है। आदर्श राज्य के निर्माण में बेहतर राज्य की कामना और उत्तम मानवीय गुणों की जरूरत होती है। राज्य की कामना किए बगैर आप मनुष्य और पशु जीवन में अंतर नहीं कर सकते, इसलिए अरस्तू मनुष्य के लिए राज्य या सत्ता का होना बहुत जरूरी मानते हैं और जरूरी है भी। लेकिन हमारे यहां जिस तरह की राज्य-व्यवस्था बनती जा रही है, उससे तो यही प्रतीत होता है कि हम जंगल-राज्य की ओर बढ़ रहे हैं। स्वयं अरस्तू आज यह व्यवस्था देखते तो यही कहते कि इससे तो जंगल-राज्य बेहतर है। क्योंकि आज की सरकारी नीतियों एवं व्यवस्थाओं से जो हालात बने हैं, उससे आम आदमी का जीना दुर्भर हो गया है। आम आदमी तो वास्तव में घुटनों से पेट ढ़कने को विवश है। लोकतंत्र मंे गरीबों के हाल का भले ही किसी को चिंता हो या न हो, करोड़ों के घोटालों से राजनीतिज्ञों का खजाना बढ़ रहा है। सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की अपनी तिजोरी तो अन्य दलों से काफी बड़ी है। हाल ही में प्रकाशित हुए तथ्यों में कांग्रेस को सबसे अधिक चंदा मिला है। कांग्रेस को सबसे अधिक चंदा क्यों मिला? इसका उत्तर भी स्पष्ट है। यह पैसा कार्पोरेट घरानों, उद्योगपतियों और पूंजीपतियों ने उसे दिया। हरकत में बरकत का मुहावरा तो ठीक है लेकिन यह बरकत राजनीतिज्ञों की हरकतों से हुई है। गरीब, किसान की आत्महत्याओं पर कांग्रेस पार्टी एवं यूपीए सरकार चुप्पी साध लेती हैं लेकिन औद्योगिक घरानों के लिए लाबिंग में वह सबसे आगे रहती हैं। इन स्थितियों में यही कहा जायेगा कि सरकार विकासहीन ही नहीं संकल्पहीन है, मुश्किल दौर में संकल्पहीन सरकारें बहुत तकलीफ देती हैं और वह तकलीफ दे रही है।

विदेशी कंपनियों को न्यौता देकर भारत के बाजार उपलब्ध कराये जा रहे हैं, एक तरह से यह एक बार पुनः विदेशी दासता की ओर देश को ढकेलना है। भारत सरकार के सालभर के बजट से भी ज्यादा की संपत्ति रखने वाली ये विदेशी कंपनियां भारत के बाजारों में आकर अपने स्टोरों के माध्यम से जो व्यापार करेगी उसके पीछे उनका नजरिया कभी भी भारत की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना न होकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना होगा। विदेशी निवेश के नाम पर कांग्रेसी जो हेकड़ी दिखा रहे हैं उससे यही लगता है कि ये देश में आपातकाल जैसी स्थिति पैदा करना चाहते हैं। इस आपातकाल से और विदेशी दासता से मुक्ति के लिए ममता ने अपना क्रांतिकारी नजरिया दर्शा दिया है मगर इस सरकार को बचाने या आगे चलने देने के लिए अगर मुलायम या मायावती में से कोई भी अपना राजनीतिज्ञ भविष्य उज्ज्वल करने के फिराक में हैं तो इस देश की जनता उन्हें कभी माफ नहीं करेगी। सरकार अगर अब भी जनविरोधी रवैया अख्तियार रखती है तो उसका भविष्य धुंधला ही कहा जायेगा। क्योंकि गणित के सवाल की गलत शुरूआत सही उत्तर नहीं दे पाती। गलत दिशा में उठा कदम या गलत दिशा का चयन सही मंजिल तक नहीं पहुंचाता। विदेशी कंपनियों को दिया गया न्यौता भले ही चमक-दमक वाला हो, लेकिन  है तो देश को खोखला करने वाला।

हमारे वर्तमान दौर की समस्याओं की जड़ भ्रष्टाचार है। बोलने वाले भ्रष्टाचार से जीने वाला भ्रष्टाचार  ज्यादा खतरनाक होता है। भ्रष्ट आश्वासन, भ्रष्ट योजना, भ्रष्ट आदर्श, भ्रष्ट परिभाषा, भ्रष्ट हिसाब, भ्रष्ट रिश्ते। चिन्तन में भी भ्रष्ट, अभिव्यक्ति में भी भ्रष्ट। यहां तक कि भ्रष्टाचार ने पूर्वाग्रह का रूप भी ले लिया है। एक भ्रष्टाचार के लिए सौ भ्रष्टाचार और उसे सही ठहराने के लिए अनेक तर्क। लगता है सत्ताशीर्ष से जुड़े लोग भ्रष्ट  बोलते ही नहीं, भ्रष्टाचार को ओढ़ भी लेते हैं। आज का जीवन माल गोदाम में लटकती उन बाल्टियों की तरह है जिन पर लिखा हुआ तो (आग) है पर उनमें भरा हुआ है पानी और मिट्टी। आर्थिक भ्रष्टाचार से ज्यादा घातक है नीतिगत भ्रष्टाचार। नीतिगत भ्रष्टाचार का धक्का कोई समाज या राष्ट्र सहन नहीं  कर सकता।

हमारे देश का कलेवर ही कुछ ऐसा है कि ईमानदारी और भ्रष्टाचार की शक्तियों के बीच परस्पर संघर्ष चलता रहता है। कभी ईमानदारी तो और कभी भ्रष्टाचार ताकतवर होता रहा है। लेकिन इन घनघोर अंधेरों के बीच आशा की एक किरण यह है कि भ्रष्टाचार एवं झूठ के इतिहास को गर्व से नहीं, शर्म से पढ़ा जाता है। आज हमें झण्डे, मंच और नारे नहीं बल्कि नैतिकता एवं ईमानदारी की पुनः प्रतिष्ठा चाहिए। हर लड़ाई झूठ से प्रारम्भ होती है पर उसमें जीत सदैव सत्य से ही होती है। अपने आपको तथाकथित गांधीवादी मानने वाले या गांधी के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों से यही कहना है कि पाप का घडा एक-ना-एक दिन फूटता जरूर है। सच्चे गांधी के अनुयायियों हमें गांधी को तस्वीर में नहीं, जीवन में अवतरित करना होगा, हमें स्वयं को गांधी बनने का संकल्प लेना होगा। गांधी बनने का अर्थ है गांधी का पुनर्जन्म, जो हमारे देश की अनिवार्य अपेक्षा है। हम कदम-दर-कदम उन पद्चिन्हों पर चले जो हमारी आस्था को यह विश्वास दें कि हमारे भीतर भी गांधी-सी सत्य एवं नैतिकता की अनन्त शक्ति है।

-ललित गर्ग –